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सितम्बर में क्यों बढ़ जाता है डिप्रेशन, एक्सपर्ट बोले भारत में ‘September Blues’ नहीं ‘Seasonal Depression’

क्या इन दिनों आपको एक अजीब सी उदासी ने घेरा है? किसी काम में आपका मन नहीं लगता? बंद और अंधेरे कमरे में अकेले रहने का मन कर रहा है, तो हो सकता है कि आप सेप्टेम्बर ब्लूज से गुजर रहे हों? अब आपके मन में सवाल आ रहा होगा कि आखिर अब ये सेप्टेम्बर ब्लूज क्या है? इस सवाल का जवाब जानने के लिए इस खबर को ध्यान से पढ़ लें...

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क्या इन दिनों आपको एक अजीब सी उदासी ने घेरा है? किसी काम में आपका मन नहीं लगता? बंद और अंधेरे कमरे में अकेले रहने का मन कर रहा है, तो हो सकता है कि आप डिप्रेशन की इस बीमारी से गुजर रहे हों, जिसके बारे में आजकल लोग सेप्टेम्बर ब्लूज कहकर बात करते हैं। अगर आप भी ऐसा ही सोचते हैं तो ये खबर आपकी गलत जानकारी को करेक्ट करने के काम आएगी। दरअसल आजकल भारत में सेप्टेम्बर ब्लूज की चर्चा आपको आम लोगों के बीच चर्चा करने पर सुनाई दे जाएगी। लेकिन मनोचिकित्सकों की मानें तो सेप्टेम्बर ब्लूज भारत में अक्टूबर या नवंबर ब्लूज बन जाता है। यानी भारत में डिप्रेशन की किसी भी बीमारी के आगे सेप्टेम्बर ब्लूज लिखना सही नहीं होगा। इसके लिए सेप्टेम्बर ब्लूज के बजाय सीजनल डिप्रेशन की प्रॉब्लम कहना ज्यादा सही होगा। यहां जानें सेप्टेम्बर ब्लूज और सीजनल डिप्रेशन का फर्क....

केस 1.

महेश (बदला हुआ नाम) कहते हैं कि उन्हें डिप्रेशन की प्रॉब्लम करीब 10 साल से है। दवाएं लेेने से उन्हें आराम जरूर मिलता है। लेकिन जैसे ही मौसम या सीजन में बदलाव आता है तब उनका डिप्रेशन बढऩे लगता है। खासतौर पर तब जब धूप नहीं निकलती। या फिर तब जब सीजन बदलना शुरू हो जाता है। अक्सर सितंबर महीने से उनका मन बेचैन होना शुरू हो जाता है। एक अजीब सी उदासी उन्हें घेरे रहती है। घर हो या बाहर किसी से भी मिलना-जुलना पसंद नहीं आता। किसी काम में मन नहीं लगता। बस ऐसा लगता है बंद और अंधेरे कमरे में आंखें बंद करके लेटे रहो, नींद आ जाए तो ठीक, नहीं तो आंखें बंद कर खुद को शांत करने की कोशिश जारी रहती है।

केस 2

प्रियंका (बदला हुआ नाम) कहती हैं कि उन्हें लॉकडाउन के समय 2020 के दौरान ऐसा हुआ था कि उनका मन बेचैन रहने लगा था, वे परिवार के साथ रहते हुए भी अकेलापन महसूस कर रही थीं। ये प्रॉब्लम सितम्बर या अक्टूबर के महीने में और बढ़ गई। जिसके बाद उन्होंने डॉक्टर को दिखाया। उनके फैमिली डॉक्टर ने उन्हें मनोचिकित्सक से एडवाइस की बात कही। जब वे डॉक्टर के पास पहुंची तब उन्हें पता चला कि वे डिप्रेशन की शिकार हो चुकी हैं। पिछले 2 साल से उनका डिप्रेशन का इलाज जारी है। लेकिन सितम्बर-अक्टूबर के महीने में खासतौर पर जैसे ही दिन छोटे होना शुरू होने लगते हैं। तब से उनकी लाइफस्टाइल चैंज होना शुरू हो जाती है। भीड़ में भी वह खुश नहीं रह पातीं अकेलापन उन्हें ज्यादा पसंद आता है। वह बिना कुछ बात किए घंटों बिताने लगती हैं। किसी काम में मन नहीं लगता।

ये तो केवल 2 ही केस हैं। राजधानी भोपाल प्रदेशभर में ऐसे एक दो नहीं बल्कि सैकड़ों केस आते हैं। जिनमें डिप्रेशन के मरीजों में मौसम या सीजन में होने वाले शुरुआती बदलाव के कारण डिप्रेशन हावी होने लगता है। लेकिन मनोचिकित्सक डॉ. रूमा भट्टाचार्य कहती हैं कि बदलते मौसम के मिजाज में हमारी हेल्थ बहुत हद तक प्रभावित होती है। खासतौर पर मेंटल हेल्थ हमें डिप्रेशन का शिकार बनाने लगती है। यूरोपयन कंट्रीज में यह स्थिति तब बनती है जब सितंबर के महीने में वहां ठंड की शुरुआत होती है। इस दौरान वहां वेकेशन होते हैं। इसलिए वहां सितंबर के महीने से डिप्रेशन के मामलों में तेजी से इजाफा होता है। यही कारण है कि इन दिनों होने वाले डिप्रेशन को वहां सेप्टेम्बर ब्लूज कहा जाता है। एक बड़ी संख्या होती है ऐसे मरीजों की। जबकि भारत में होता है सीजनल डिप्रेशन डिप्रेशन के मामले दुनिया भर में तेजी से बढ़े हैं। भारत में खासतौर पर डिप्रेशन के मामले अक्टूबर महीने के बीच या आखिरी दिनों में सामने आने लगते हैं। इसका कारण होता है सीजन में होने वाला बदलाव। इसलिए इन दिनों अगर आपको भी उदासी, निराशा घेर रही है, अकेले रहने का मन कर रहा है, घबराहट हो रही है या फिर मन परेशान हो रहा है, तो सोशल मीडिया पर हेल्द अपडेट देखकर इसे सेप्टेम्बर ब्लूज न समझें।

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डॉ. रूमा भट्टाचार्य बताती हैं कि कहते हैं कि जैसे-जैसे सर्दियों के दिन करीब आने वाले होते हैं यानी सीजन बदलाव की ओर बढऩे लगता है, तो उदासी और निराशा का यह एहसास और भी गहरा हो जाता है। हल्का सा सीजनल बदलाव इन दिनों बारिश के कारण नजर आ रहा है। लेकिन वास्तव में इसकी शुरुआत हमारे यहां अक्टूबर महीने से होती है। जब दिन छोटे और रातें लंबी होने लगती हैं। धूप की कमी का अहसास डिप्रेस करने लगता है। सबसे ज्यादा परेशानी उन्हें होती है, जो पहले से ही डिप्रेशन की गिरफ्त में हैं।

सीजनल डिप्रेशन से कैसे बचा जाए
डॉ. रूमा भट्टाचार्य कहती हैं कि सीजनल डिप्रेशन में सूरज की रोशनी मस्तिष्क के उस हिस्से पर असर डालती है, जो सोने और ऊर्जा के स्तर का नियमन करता है। इसका सबसे बुरा असर ये हो सकता है कि आप सर्दी के महीनों में सामान्य काम करने के लायक भी नहीं रहते।

- जब सूरज की रोशनी अच्छी और पर्याप्त होती है तो ऐसे लोगों के लिए माहौल कुछ आरामदायक हो जाता है। इन लोगों के मन में सर्दियों को आता देख यह सवाल आने लगता है कि गर्मी क्यों चली गई। इन्हें लगता है मानो कुछ खो गया हो।

- इससे बचने के लिए गर्मियों के रूटीन या आदत को छोड़कर आने वाले सर्दियों के महीनों में चुनौतियों का सामना करने की तैयारी करनी चाहिए।

- सेहत से जुड़ीं डेली की आदतों को बनाए रखें उनका रूटीन टूटने न दें।

- लोगों, दोस्तों से मिलने-जुलने की आदत बनाए रखें। ये आपको Seasonal Depression से बचाए रखेगा।

- इससे बचने के लिए डॉक्टर्स पहले से ही प्लानिंग करने और उसे फॉलो करने की एडवाइस देेते हैं।

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