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मप्र सरकार दो हजार करोड़ का कर्ज और लेगी, प्रस्ताव बुलाए

वित्तीय कंपनियों से बुलाए गए हैं प्रस्ताव

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भोपाल। राज्य सरकार को खर्च के लिए राशि की जरूरत है। इसलिए फिर से कर्ज लिया जा रहा है। यह कर्ज दो हजार करोड़ का होगा। इसके लिए वित्तीय कंपनियों के प्रस्ताव बुलाए गए हैं। यह कर्ज दस साल के लिए होगा। सरकार का तर्क है कि यह कर्ज विकास कार्यों के लिए है।

राज्य का बजट 2.71 लाख करोड़ का है। बजट से ज्यादा राज्य पर कर्ज है। राज्य सरकार अगले माह शुरू हो रहे विधानसभा के मानसून सत्र में सप्लीमेंट्री बजट भी पेश करेगी।

ऐसे समझें खजाने की स्थिति -
बाजार कर्ज : 174373.24,
कंपसेशन और बाण्ड : 7360.44,
संस्थाओं से कर्ज : 12158.01,
केन्द्र से : 44675.55,
अन्य देनदारियां : 22208.99,
राष्ट्रीय बचत स्कीम : 3475.68 (राशि करोड़ में, मार्च 2022 तक)

MP का हर शख्स 41 हजार का कर्जदार:
इससे पहले करीब 3 माह पूर्व ही साल 2022 में ही मध्यप्रदेश पर उसके सालाना बजट से भी ज्यादा कर्ज रहा है। यानी स्टेट की स्थिति उस घर की तरह हो गई है, जिसकी इनकम कम और कर्जा ज्यादा है। पूर्व में CM शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में यह कर्ज बढ़कर 3 लाख 32 हजार करोड़ रुपए हो गया था। जो दिग्विजय सिंह सरकार की विदाई के वक्त से 16 गुना अधिक था।

करीब तीन माह पहले तक भी विशेषज्ञ हैरान थे कि कर्ज में डूबी सरकार ने दो साल में बाजार से एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का लोन उठा लिया है। यह अब तक लिए गए कुल लोन का एक तिहाई है। इसका असर यह हुआ कि मप्र के हर व्यक्ति पर पांच साल में ही कर्ज बढ़कर डबल हो गया। ऐसा संभवत: पहली बार था। इस समय तक जॉब्स नहीं मिलने से प्रदेश में एक ही साल में पांच लाख से ज्यादा नए बेरोजगार बढ़ गए थे।

करीब 3 माह पहले तक शिवराज सरकार में मप्र के हर व्यक्ति के माथे अब 41 हजार रुपए कर्जा था। वहीं जानकारों की मानें तो इसी रफ्तार से बढ़ोतरी के चलते यह कर्ज अगले साल बढ़कर 47 हजार रुपए तक पहुंच जाना था, लेकिन अब एक बार फिर सरकार कर्ज लेने जा रही है। जबकि 2017 तक यह कर्ज 21 हजार रुपए था।

दिग्विजय सिंह के 10 साल के शासन के आखिरी साल यानी 2003-04 में प्रदेश पर 20 हजार करोड़ रुपए का कर्ज था, जो प्रति व्यक्ति 3300 रुपए आता है।

जानकारों के अनुसार कर्ज बढ़ोतरी के दो अलग मायने हैं। पहला सरकार का, दूसरा अर्थशास्त्रियों का। मप्र का बजट 2022-23 के लिए कुल 2.71 लाख करोड़ है और कर्ज करीब तीन माह पहले तक 3 लाख 31 हजार करोड़ रुपए।

कुछ अर्थशास्त्रियों का यह तक मानना है कि ‘सरकार भले ही नियमों के तहत कर्ज लेती है लेकिन लोकलुभावन वादों की राजनीति हावी होती जा रही है। सरकार जिस रफ्तार से कर्ज लेने लगी है, इस पर कंट्रोल जरूरी है। ऐसा नहीं किया और फ्री बांटने की स्ट्रेटजी नहीं बदली, तो भविष्य में श्रीलंका जैसे हालात बन जाएंगे।