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बैठक द आर्ट हाउस: 10 और 12 मात्रा में पेश की बंदिशें

ध्रुपद और खयाल गायन की प्रस्तुतियां

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बैठक द आर्ट हाउस: 10 और 12 मात्रा में पेश की बंदिशें

भेपाल। बैठक - द आर्ट हाउस में शनिवार संगीत की बैठक का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में गायन, वादन तथा ध्रुपद एवं खयाल की प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम की शुरुआत बनारस के डागर घराने के ध्रुपद गायक राजेश सेंध के गायन से हुई। उन्होंने डागर वाणी की शुद्धता को बनाए रखते हुए राग भूपाली में आलाप, जोड़, झाला से शुरुआत की।

इसके बाद प्राचीन और पारंपरिक बंदिश बोल है आई है घटा... चौताल 12 मात्रा में पेश की। कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए दूसरी बंदिश तेरे मन में कितना गुना रे जो तू हो तितो प्रकाश कर ले... सूल ताल 10 मात्रा में प्रस्तुत की। इस दौरान उनके साथ पखावज पर संगत रवि द्विवेदी ने खूबसूरती के साथ दी। दूसरी प्रस्तुति भोपाल के बांसुरी वादक अभय फागरे ने दी।

बांसुरी वादन में गायन एवं वादन दोनों की ही विविधता, गहराई एवं सूक्ष्मता का समावेश है जो राग की बारीकियां, मधुरता एवं बंदिशों की मिठास को बहुत ही सम्वेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करता है। उन्होंने शुरुआत तीन ताल में राग यमन से की। इसके बाद राग जय जयवंती का चयन करते हुए तीन ताल में विलंबित एवं द्रुत गत पेश की। राग भैरवी से कार्यक्रम का समापन किया। तबले पर मनोज पाटीदार ने संगत दी।

मन घूमता है किनारे...

हिंदी भवन में शनिवार को कवि पंकज राग का रचना पाठ हुआ। इस मौके पर उन्होंने रोजमर्रा के जीवन से जुड़े विषयों से कविताएं पेश कीं। स्पंदन संस्था की ओर से आयोजित कार्यक्रम में पंकज ने सरल-सहज भाव के साथ कविताएं सुनाईं। उन्होंने दहशत विषय पर कविता इसलिए अच्छा लगता है शाम में घर लौटना... पेश की।

इसके बाद या खुदा यह भी क्या मंजर है... और मुंबई विषय पर कुछ छोटी कविताएं सुनाईं। इसमें रेत गंदी होने से पैरों के निशान नहीं मिट जाते..., मन घूमता है किनारे पर किसी अंतिम लहर की तरह... और जिन फांसलों को खोजता हूं मैं वे सिर्फ वक्त के ही तो फांसले नहीं है... प्रमुख रही। कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए नींद विषय पर खूबसूरत कविता प्रस्तुत की।

झपकती हुई किसी शाम में जब धूप का आखरी कतरा गुम हो... और नींद के घर में बहुत महफूज रहता हूं मैं, नींद ही तो है जो आज भी बची हुई है पड़ोस और मुहल्लों से... की प्रस्तुति दी। इसके बाद उन्होंने ऐसे बच्चे शीर्षक से कविता एक छोटे से बच्चे को एनक लगाए देखना बहुत अजीब लगता है... सुनाई।

उनकी कविता बहुत समसामायिक और अपनी-सी लगी। बीच में श्रोता प्रतिक्रिया भी देते रहे। इस मौके पर बड़ी संख्या में साहित्य बिरादरी से जुड़े लोग उपस्थित थे।