उन्होंने अपने पिता की कुछ कंपोजीशन और बशीर बद्र साहब, बद्र वास्ती, जावेद अख्तर, गालिब साहब की नज्मों को अपने अंदाज में पेश किया। अपनी प्रस्तुति में उन्होंने 'शहर के दुकानदारों कारोबार ए उल्फत में' और आबिदा परवीन की 'जी चाहे शीशा बन जा, जी चाहे पैमाना बन जा' भी पेश किया। उनके साथ तबले पर प्रशांत सोनागरा, कीबोर्ड पर धर्मेश, ढोलक पर सुरेंद्र और वॉयलिन पर राशिद ने संगत दी।