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जीवन के हर मोड़ पर गुरु बने पथ प्रदर्शक तो सफलता पाना हुआ आसान

27 जुलाई गुरु पुर्णिमा विशेष, गुरु ने दिखाई सफलता की राह

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sanjay upadhyay

sanjay upadhyay

भोपाल. भारतीय संस्कृति में गुरु को भगवान के समान दर्जा दिया जाता है, इसके पीछे वजह भी है कि जीवन के प्रत्येक मोड़ पर जब-जब मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है, तब गुरु ही मार्ग प्रशस्त करता है। सफल जीवन के लिए उचित सलाह और मागदर्शन का ही परिणाम है कि तमाम परेशानियों को दरकिनार कर लोगों ने अपने-अपने क्षेत्रों में न केवल सफलता हासिल की है, बल्कि आज समाज के लिए नजीर बने हुए हैं। गुरु पूर्णिमा के मौके पर सफल लोगों ने अपने जीवन में गुरु के महत्व को साझा किया।

माता-पिता ही प्रथम गुरु
'हर कदम से नादान थे तुम, गीली मिट्टी के समान थे तुम, आकार देकर तुम्हें घड़ा बना दिया, अपने पैरों पर खड़ा कर दिया। कवि अंशुमन दुबे की इन पंक्तियों ने मुझे हमेशा प्रेरित किया और जिंदगी दशा और दिशा बदल गई। ये कहना है भेल के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर ठीके ठाकुर का।

माता-पिता को अपना प्रथम गुरु मानने वाले ठाकुर का कहना है कि हम स्कूल-कॉलेज में बहुत पढ़ लेते हैं, लेकिन जब तक गुरु के शब्दों और सपनों को अपने जीवन में न उतार लें तब तक ये जीवन किसी काम का नहीं। ठाकुर का कहना है कि माता-पिता का सपना होता है कि उनका बेटा-बेटी उच्च मुकाम तक पहुंचे। भगवान के बाद हमारे पहले गुरु यही हैं। इनसे ही हम संस्कार, आत्मविश्वास, व्यवहार सीखते हैं।

गुरु लाए जीवन में सुखद बदलाव
गुरु ही एक ऐसा व्यक्ति है जो न केवल अपने शिष्यों के हुनर को पहचान लेता है, बल्कि उसे सफल बनाने में दिन-रात एक कर देता है। मप्र नाट्य विद्यालय के निदेशक संजय उपाध्याय का कहना है कि मैं आज जो भी हूं वो गुरु धनंजय नारायण सिन्हा की बदौलत हूं। उन्होंने ही मुझे सबसे पहले थियेटर के बारे में बताया। इनकी ही बदौलत वर्ष 1977-78 में कोणार्क नाट्य में काम करने का अवसर मिला।

संजय बताते हैं कि ११वीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान कोणार्क नाटक का मंचन होना था और इसके लिए कलाकारों का ट्रायल लिया जा रहा था। इस दौरान मुझे भी मौका मिला और जो वाक्य पढऩे के लिए दिए गए तो उन्हें आसानी से पढ़ दिया, जबकि ये वाक्य हिन्दी और संस्कृत में थे। उपाध्याय ने बताया कि संस्कृत की शिक्षा उन्हें नाना से मिली थी। इसके बाद से उपाध्याय की अगुआई में देश-विदेश में सात सौ से अधिक नाटकों का मंचन हो चुका है।

शिक्षा का उजियारा फैलाने की मिली सीख
मेरे गुरु का सपना है कि हर बच्चा संस्कारी और शिक्षित बने। इसी सपने को साकार करने के लिए मैं शिक्षण संस्थाओं एवं समाजसेवी संस्थाओं में सक्रिय हूं। गुरु की प्रेरणा से आज इन संस्थाओं से शिक्षा पाने वाले सैकड़ों विद्यार्थी प्रदेश, देश-विदेश में आला पदों पर सुशोभित हैं। ये कहना है करोंद स्थित गीतांजति कॉलेज की जनभागीदारी समिति अध्यक्ष राजेश जोधवानी का।

सेवा संस्था एवं सेंट्रल सिंधी पंचायत से जुड़े जोधवानी आईटी सेल के जरिये स्कूल-कॉलेज में अध्ययनरत विद्यार्थियों को आधुनिक तकनीक से भी रूबरू करा रहे हैं। उन्होंने बताया कि संत हिरदाराम एवं उनके माता-पिता के मुताबिक जितने अधिक लोगों को ज्ञान और संस्कार देंगे, वही तुम्हारा कर्म है। यदि इस कर्म में सफल हो गए तो सफलता कदम चूमेगी। जोधवानी के मुताबिक उनकी सफलता में गुरु के बताए आदर्शों का अहम योगदान है।