मध्यप्रदेश की इस सीट पर एक ही परिवार का चलता है राज! तीन पीढ़ियां 14 बार जीत चुकी हैं चुनाव

मध्यप्रदेश की इस सीट पर एक ही परिवार का चलता है राज! तीन पीढ़ियां 14 बार जीत चुकी हैं चुनाव

Deepesh Tiwari | Updated: 11 Mar 2019, 04:33:54 PM (IST) Bhopal, Bhopal, Madhya Pradesh, India

एक ही राजपरिवार का वर्चस्व, हर पार्टी पर पड़ता है भारी! जानिये यहां के खास और दिलचस्प किस्से...

भोपाल। मध्यप्रदेश सहित देश की सभी लोकसभा सीटों पर चुनाव की तारीखें घोषित हो गईं हैं। ऐसे में मध्यप्रदेश में एक लोकसभा सीट ऐसी भी हैं, जहां से एक ही परिवार की की तीन पीढ़ियां लोकसभा के 14 बार चुनाव जीत चुकी हैं।

यहीं नहीं इस परिवार का इस क्षेत्र में इतना प्रभाव है कि यदि इस परिवार का कोई शख्स यहां से खड़ा हो जाता है तो वह हर पार्टी पर भारी ही पड़ता है। कुल मिलाकर यहां संसदीय चुनाव की शुरुआत से अब तक एक ही परिवार का कब्जा यथावत रहा है।

जी हां एक ऐसी सीट जहां पार्टी के वर्चस्व से पहले एक परिवार का वर्चस्व है। और जिसके कारण कई सूरमा यहां आकर धूल चाटने को मजबूर हो चुके है। हम बात कर रहे हैं, मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से करीब 200 किलोमीटर दूर स्थित गुना लोकसभा सीट की, जहां आज भी सिंधिया राजपरिवार का राज चलता है यानि किसी भी स्थिति में यदि राजपरिवार का कोई सदस्य यहां से चुनाव में उतरता है, तो उसकी जीत पक्की मानी जाती है।

दरअसल मध्य प्रदेश के उत्तर भाग में स्थित गुना शहर को मालवा का प्रवेश द्वार कहा जाता है, स्वतंत्रता से पहले गुना ग्वालियर राज घराने का हिस्सा था।

इस सीट की खास बात यह है कि अकेले सिंधिया परिवार ने 1957 से लेकर अब तक 14 बार इस लोकसभा सीट पर जीत हासिल की है। जिसमें दादी से लेकर नाती तक शामिल रहे हैं और इसमें एक यह भी खास बात है कि सिंधिया परिवार के सदस्य चाहे वह दलीय उम्मीदवार के रूप में खड़े हो अथवा निर्दलीय उन्हें हर बात जीत ही हासिल हुई है।

 

 

 


राजपरिवार की तीन पीढ़ियां और 14 चुनाव...
मध्यप्रदेश की गुना लोकसभा सीट देश की एकमात्र सीट है, जहां संसदीय चुनाव की शुरुआत से अब तक एक ही परिवार का कब्जा यथावत रहा है। अभी यहां से कांग्रेस के ज्योतिरादित्य सिंधिया सांसद हैं, वो इस सीट पर लगातार चार बार से सांसद हैं और गुना की जनता उन्हें महाराज कहकर संबोधित करती है, वहीं उनके पिता स्व. माधवराव सिंधिया भी इसी सीट पर सांसद थे।

यहां की कुल जनसंख्या 24 लाख से ज्यादा है, जिसमें से 76 प्रतिशत आबादी गांवों में और 23 प्रतिशत शहरों में निवास करती है।

इस सीट का खास इतिहास
गुना लोकसभा सीट का इतिहास बड़ा रोचक रहा है। आजाद भारत में हुए सबसे पहले लोकसभा चुनावों में 1951 में इस सीट से हिंदू महासभा के विष्णु गोपाल देशपांडे ने कांग्रेस के गोपीकृष्ण विजयवर्गीय को हराया था। तब पहले परिसीमन के अनुसार यह लोकसभा क्षेत्र मध्यभारत राज्य के अंतर्गत था।

उस वक्त देशपांडे ग्वालियर और गुना दोनों सीटों से चुनाव जीते थे, बाद में ग्वालियर सीट रिक्त कर गुना सीट अपने पास रखी थी। वहीं 1956 में भाषावार राज्यों के पुनर्गठन के चलते नया मध्यप्रदेश अस्तित्व में आया, जिसके बाद यह क्षेत्र गुना-शिवपुरी लोकसभा क्षेत्र हो गया और इसी दौरान ग्वालियर राजमहल भी राजनीति से जुड़ गया, क्योंकि महारानी विजयाराजे सिंधिया कांग्रेस में शामिल हो गई।

इसके बाद 1957 में उन्होंने कांग्रेस की ओर से गुना शिवपुरी लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा और विष्णु देशपांडे को लगभग 50 हजार वोटों से करारी शिकस्त दी। 1962 में विजयाराजे सिंधिया ने अपना लोकसभा क्षेत्र परिवर्तन कर ग्वालियर से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की, वहीं गुना शिवपुरी लोकसभा क्षेत्र में कांग्रेस से रामसहाय शिवप्रसाद पांडे ने 20 हजार वोटों से एक बार फिर विष्णु देशपांडे को हरा दिया।

लेकिन बाद में मतभेद के चलते राजमाता ने कांग्रेस छोड़ दी और 1967 में वो यहां स्वतंत्र पार्टी से जीती लेकिन 1971 में यहां बड़ा उलटफेर हुआ और विजयाराजे सिंधिया के सुपुत्र माधवराव सिंधिया यहां से जनसंघ के टिकट पर चुनाव जीते और इसके बाद उन्होंने 1977 में निर्दलीय रूप से जीत दर्ज की और इसके बाद उन्होंने कांग्रेस ज्वाइन कर ली और साल 1980 के चुनाव में वो यहां से कांग्रेस के टिकट पर जीतकर लोकसभा पहुंचे, तो वहीं राजमाता ने भाजपा ज्वाइन कर ली।


1984 में भी यहां कांग्रेस का राज रहा लेकिन 1989 के चुनाव में बाजी पलट गई और यहां भाजपा जीत गई और एक बार फिर से राजमाता विजयराजे सिंधिया यहां पर भारी मतों से विजयी हुईं वो यहां पर 1998 तक सांसद रहीं लेकिन 1999 के चुनाव में कांग्रेस के साथ-साथ माधवराव सिंधिया की इस सीट पर वापसी हुई।

2001 में हुई एक हवाई दुर्घटना में माधवराव सिंधिया का असामायिक निधन हो जाने के बाद उनके पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया ने 2004 के चुनावों से सक्रिय राजनीति में पदार्पण किया और गुना को ही संसदीय क्षेत्र चुना, तब से लेकर अब तक ज्योतिरादित्य सिंधिया ही इस सीट से सांसद हैं और भाजपा यहां जीत के लिए तरस रही है।

 

गुना-शिवपुरी लोकसभा सीट के कुछ खास चर्चित किस्से...-
कहा जाता है सबसे पहले लोकसभा चुनावों में 1951 में इस सीट से जीते हिंदू महासभा के विष्णु गोपाल देशपांडे महात्मा गांधी के घोर विरोधी थे। भारत के विभाजन का जिम्मेदार वे उन्हें ही मानते थे।

महात्मा गांधी की हत्या के तीसरे दिन ही उन्हें गिरफ्तार किया गया था। विश्व हिंदू परिषद की स्थापना में भी वे शामिल रहे थे। 1956 में भाषावार राज्यों के पुनर्गठन के फलस्वरूप नया मध्यप्रदेश अस्तित्व में आया। तदनंतर किये गए परिसीमन के मुताबिक यह क्षेत्र गुना-शिवपुरी लोकसभा क्षेत्र कहलाया तथा विदिशा(भेलसा) के नाम से एक नए लोकसभा क्षेत्र का जन्म हुआ।

इसी दौरान ग्वालियर राजमहल राजनीति से जुड़ गया तथा विजयाराजे सिंधिया कांग्रेस में शामिल हो गई और ग्वालियर राजमहल का भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में जुड़ाव हो गया।

वहीं 1962 में विजयाराजे सिंधिया ने अपना लोकसभा क्षेत्र परिवर्तन कर ग्वालियर से चुनाव लड़ा तथा विजयश्री हासिल की वहीं गुना शिवपुरी लोकसभा क्षेत्र में कांग्रेस से रामसहाय शिवप्रसाद पांडे ने 20 हजार वोटों से एक बार फिर विष्णु देशपांडे को हरा दिया।


वहीं 1963 के एक घटनाक्रम में प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा जलजला आ चुका था। कांग्रेस आलाकमान से मतभेद के चलते 1962 के चुनाव में टिकट से वंचित रहे तथा कांग्रेस आलाकमान की नाराजगी ङोल रहे द्वारकाप्रसाद मिश्र ने नेहरू परिवार के वफादार सहयोगी उमाशंकर दीक्षित के माध्यम से सक्रिय राजनीति में पदार्पण की तैयारी कर रही इंदिरा गांधी से भेंट की तथा चतुराई के साथ उनसे करीबी संबंध स्थापित कर लिये.

बारह वर्ष के राजनीतिक वनवास के उपरांत मध्यप्रदेश की सियासत के केंद्र में आ गए। इंदिरा के आशीर्वाद से मिश्र कसदौल विधानसभा क्षेत्र से जीत कर सितम्बर 1963 में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बना दिये गये।

जब राजमाता और मिश्र में ठनी
1967 में ग्वालियर राजमहल का पार्टी के टिकट वितरण को लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारिकाप्रसाद मिश्र से मतभेद हो गया। दरअसल विधानसभा टिकट वितरण के संदर्भ में विजयाराजे सिंधिया ग्वालियर संभाग के टिकट अपनी इच्छा से देना चाहती थीं जिसे मिश्र ने नामंजूर कर दिया और दो टूक जवाब दे दिया कि ऐसा होना मुमकिन नहीं है।

विजयाराजे सिंधिया के तत्कालीन राजनीतिक सलाहकार सरदार आंग्रे ने उन्हें सुझाया कि नए सिरे से स्टेण्ड लीजिये और द्वारका प्रसाद मिश्र को सबक सिखाईये। तब उन्होंने स्वतंत्र पार्टी से गुना विधानसभा क्षेत्र का टिकट रमनलाल प्रेमी जो उस समय जिला कांग्रेस अध्यक्ष थे, उनको दिया।

जबकि स्वयं गुना शिवपुरी क्षेत्र से लोकसभा चुनाव लडऩे के साथ ही जनसंघ पार्टी से करैरा विधानसभा क्षेत्र का चुनाव भी लड़ा जहां से उन्होंने द्वारका प्रसाद मिश्र के निकटतम रहे गौतम शर्मा को परास्त किया तथा लोकसभा चुनावों में भी महल से ही संबद्ध रहे तथा अपने रिश्तेदार देवराव कृष्णराव जाधव को बड़े अंतर से शिकस्त दी।

समूचे मध्यभारत में महल से संबद्ध राजनीति करने वालों को टिकट देकर उनका प्रचार किया और कमोबेश विजयाराजे सिंधिया के सभी उम्मीदवार चुनाव जीते।

1967 के चुनाव के बाद यद्यपि कांग्रेस को बहुमत मिल गया लेकिन कांग्रेस से इतर बड़ी संख्या में विधायक जीतने के कारण इस प्रदेश में राजनीति के बड़े समीकरण बनना आरंभ हुए। इसी दौर में दलबदल की पृष्ठभूमि तैयार हुई जिसके चलते मिश्र सरकार का पतन हो गया।

बनवाई संविद सरकार
30 जुलाई 1967 को संविद सरकार अस्तित्व में आई और विजयाराजे सिंधिया के आशीर्वाद से तथा उनके जिताए हुए प्रत्याशियों के सहयोग से गोविंद नारायण सिंह मुख्यमंत्री बने। लेकिन ये अधिक समय तक नहीं चली परिणाम स्वरूप विधायकों के अनुचित हस्तक्षेप के चलते 12 मार्च 1969 को गोविंद नारायण सिंह ने त्यागपत्र दे दिया।

13 मार्च 1969 को राजा नरेशचंद्र सिंह मुख्यमंत्री घोषित हुए तथा 25 मार्च 1969 को त्यागपत्र देकर वे भी चलते बने। मध्यप्रदेश की राजनीति में यह दौर सर्वाधिक घटनाक्रम वाला साबित हुआ, एक बार फिर विधायकों का दलबदल हुआ और 26 मार्च 1969 को मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री पं.रविशंकर शुक्ल के ज्येष्ठ पुत्र श्यामाचरण शुक्ल ने मुख्यमंत्री के रूप में प्रदेश की कमान संभाली।

माधवराव सिंधिया का पदार्पण...
1970 में हुए उपचुनाव में जीवटराम कृपलानी ने निर्दलीय रुप से चुनाव लड़ा और कांग्रेस की सुभ्रा जोशी को हराया। इससे पहले तक जीवटराम कृपलानी कांग्रेस के बहुत वजनदार नेताओं में गिने जाते थे।

भारत का प्रथम प्रधानमंत्री चुने जाने के लिये कांग्रेस में जो वोटिंग हुई थी उसमें सरदार पटेल के बाद कृपलानी दूसरे स्थान पर रहे थे। बाद में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी थी लेकिन उनकी पत्नी सुचेता कृपलानी कांग्रेस में ही रही थीं। इस दौरान महल के एक और सदस्य विजयाराजे सिंधिया के सुपुत्र माधवराव सिंधिया ने राजनीतिक पदार्पण किया और गुना से चुनाव लड़े।

उन्होंने कांग्रेस के डीके जाधव को सवा लाख से अधिक मतों से परास्त किया। अभी तक गुना लोकसभा क्षेत्र विकास की दृष्टि से अत्यंत पिछड़ा हुआ क्षेत्र था। यहां तक कि गुना नगर की एक मात्र सड़क सदरबाजार ही डामरीकृत हो सकी थी।

सिंधिया हुए कांग्रेस में शामिल
इस पिछड़ेपन को माधव राव सिंधिया ने माना कि यदि क्षेत्र में विकास किया जाना है तो उन्हें कांग्रेस पार्टी की राजनीति करना होगी। कारण उस समय कांग्रेस मध्यप्रदेश तथा नईदिल्ली दोनों ही जगत सत्तासीन थी।

अत: उन्होंने जनसंघ पार्टी छोडऩे का मन बना लिया और 1977 में माधवराव सिंधिया ने निर्दलीय रूप से चुनाव लड़ा और चौधरी चरणसिंह द्वारा बनाए गए भारतीय लोकदल से प्रत्याशी बने गुरुबख्श सिंह को लगभग 80 हजार मतों से हराया।

वहीं 1984 के चुनावों में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुनसिंह के कहने पर माधवराव सिंधिया ने गुना क्षेत्र छोड़कर ग्वालियर से चुनाव लड़ा और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता अटलबिहारी वाजपेयी को परास्त कर भारत में लोकप्रियता हासिल कर ली।

वहीं उन्होंने अपने विश्वस्त महेंद्र सिंह कालूखेड़ा को यहां से चुनाव लड़ाया। महेंद्र सिंह ने भारतीय जनता पार्टी से अपनी किस्मत आजमा रहे उद्धव सिंह को 1 लाख 40 हजार वोटों से हराया था।

20 साल बाद बाद लौटीं विजयाराजे सिंधिया
1989 के चुनावों में राजमाता सिंधिया पुन: यहां से चुनाव लड़ीं। 20 साल के लंबे अंतराल के बाद गुना आई राजमाता को यहां की जनता ने हाथों हाथ लिया। उन्होंने कांग्रेस के महेन्द्र सिंह को 1 लाख 46 हजार मतों से हराया। यद्यपि महेन्द्र सिंह कालूखेड़ा ने उन्हें एक प्रकार से वॉकओवर दे दिया था।

इसके बाद तो यह सीट राजमाता सिंधिया की ही होकर रह गई थी। 1991 तथा 1996 में पुन: विजयाराजे सिंधिया यहां से सांसद निर्वाचित हुईं।

दोनों ही बार उन्होंने कांग्रेस के शशिभूषण वाजपेयी तथा केपी सिंह को हराया 1998 में उन्होंने देवेन्द्र सिंह रघुवंशी को चुनाव हराया। यह एक एतिहासिक चुनाव था। विजयाराजे सिंधिया बहुत बीमार थीं और अस्पताल में भर्ती थीं।

बस नामांकन की औपचारिकता ही उन्होंने पूरी की। चुनाव प्रचार के लिए 1 मिनट का समय भी नहीं निकाला। मतदान के एन 2 रोज पहले अफवाह उड़ाई गई कि राजमाता नहीं नहीं, जवाब में हर चौराहे पर पोस्टर चिपके मिले जिसमें विजयाराजे सिंधिया के फोटो के नीचे लिखा था 'मैं अभी जिंदा हूं'। अफवाह बेकार हो गई और बिना प्रचार के विजयाराजे फिर विजयी हो गई।

वहीं एक हवाई दुर्घटना में माधवराव सिंधिया का असामायिक निधन के बाद उनके पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया ने 2004 के चुनावों से सक्रिय राजनीति में पदार्पण किया। भाजपा ने इस बार घुर सिंधिया विरोधी कांग्रेसी नेता हरिबल्लभ शुक्ला को मैदान में उतारा लेकिन इस बार भी जीत सिंधिया की ही हुई।

2009 में ज्योतिरादित्य सिंधिया एक बार फिर भाजपा के कद्दावर नेता नरोत्तम मिश्रा से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे थे। आरंभ से लेकर वर्तमान तक गुना शिवपुरी लोकसभा क्षेत्र में सिंधिया परिवार का वर्चस्व कायम रहा।

वहीं इसके बाद 2014 में देश में मोदी लहर के बावजूद मध्यप्रदेश की इस सीट से एक बार फिर सिंधिया परिवार का ही वर्चस्व देखने को मिला, जिसमें मध्यप्रदेश के कई कांग्रेसी दिग्गजों के ढह जाने के बावजूद ज्योतिरादित्य सिंधिया अपनी इस सीट से जीत कर संसद में पहुंचे।

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