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5 माह में आठ करोड़ रुपए वेतन में ही खर्च हो गए, कारीगरों से लेकर ट्रायबल स्कूल तक नहीं पहुंचा विज्ञान

मेपकास्ट की गतिविधियां ठप, न स्थाई डीजी, न हीं काम बढ़ाने बजट

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भोपाल/ मप्र विज्ञान एवं प्रोद्यौगिकी परिषद की गतिविधियां पूरी तरह से ठप हो गई है। स्थिति ये हैं कि बीते पांच माह में शासन से मिले दो किस्त में बजट के आठ करोड़ रुपए यहां के वैज्ञानिकों और कर्मचारियों के वेतन पर ही खर्च हो गए। विज्ञान मंथन यात्रा के तहत कारीगरों की कार्यकुशलता बढ़ाने, ट्रायबल स्कूलों में विज्ञान की गतिविधियों से जागरूकता बढ़ाने का कोई काम नहीं हुआ।

मेपकास्ट हर साल प्रदेशभर के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े कारीगरों की कार्यकुशलता बढ़ाने कारीगर विज्ञान कांग्रेस का आयोजन कराता है। इसमें विज्ञान की मदद दिलाने देशभर के एक्सपट्र्स के साथ वर्कशॉप कराई जाती है। प्रदेश के ट्रायबल क्षेत्रों के स्कूलों में विज्ञान से जुड़ी गतिविधियां लगातार होती थी, ताकि यहां के बच्चों की सोच वैज्ञानिक हो, लेकिन यहां भी कोई काम नहीं हुआ।

मेपकास्ट प्रबंधन इसकी वजह बजट नही मिलना बता रहा है। शासन से मेपकास्ट को मिली राशि यहां के वैज्ञानिक और कर्मचारियों के वेतन में ही खत्म हो गई। विज्ञान के लोकव्यापीकरण को लेकर कोई काम नहीं हुआ। दरअसल शासन मेपकास्ट को स्थायी डीजी नहीं दे पाया। यहां डीजी का काम काज प्रभार पर चल रहा है। स्थायी डीजी की आमद के बाद ही यहां विज्ञान की गतिविधियां बढऩे की उम्मीद की जा रही है।

गौरतलब है कि प्रदेश में विज्ञान को बढ़ावा देने की एकमात्र संस्था होने की वजह से विज्ञान से जुड़ी तमाम गतिविधियां यहीं से संचालित होती है। यहां ठप पड़ी गतिविधियों का असर विज्ञान के रिचर्स पर भी हो रहा है। प्रदेशभर में विभिन्न मामलों में रिसर्च कर रहे लोगों को, संस्थाओं को रिचर्स वर्क के लिए यहां से ग्रांट भी मिलती थी, लेकिन ये नहीं मिल पा रही।

कई रिसर्चर अपना काम आगे बढ़ाने मदद के आवेदन लगाए हुए हैं, लेकिन इनपर प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ रही।
मेपकास्ट का सालाना बजट 34 करोड़ रुपए का है। इस साल इसका 50 फीसदी यानि लगभग 18 करोड़ रुपए ही शासन ने मंजूर किया है। इसमें भी अब तक महज दो किस्त ही मिली है, जिससे संस्थान के वैज्ञानिकों व कर्मचारियों का वेतन ही निकला है। विभागीय मंत्री पीसी शर्मा का कहना है कि उनके संज्ञान में ये हैं और वे इसे बेहतर करने की कवायद कर रहे हैं।