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भोपाल. स्वच्छ सर्वे के पांचवें साल में अब नगर निगम घरों से निकलने वाले ग्रे और सीवेज के गंदे पानी को उपचारित कर उपयोग लायक बनाने में जुटा है। राजधानी को इसके लिए 'वाटर प्लस सिटीÓ घोषित करने की कवायद जारी है। महापौर परिषद ने इसका संकल्प पारित किया है। शहरवासी भी इस विषय में अपने सुझाव व आपत्तियां 18 दिसंबर तक हर्षवर्धन नगर स्थित नगर निगम मुख्यालय में जमा करा सकते हैं।
वाटर प्लस सिटी का तमगा हासिल करने शहर में दस फीसदी ब्लैक वाटर को फिर से उपयोग लायक बनाना जरूरी है। दरअसल, वाटर प्लस प्रोटोकॉल का उद्देश्य शहरों और कस्बों में वेस्ट वाटर को पर्यावरण उपयोगी बनाने के लिए गाइडलाइन तैयार करना है। इसके बाद ही वाटर प्लस का दर्जा मिलेगा। इसे स्वच्छ सर्वे-2020 के पांचवें एडिशन में जगह दी गई है।
वाटर प्लस सिटी का तमगा चाहिए तो करने होंगे इतने सुधार
- रहवासी क्षेत्रों में जल व्यवस्था, सेप्टिक टैंक, जल-मल निकासी व डिस्पोजल का संयोजन सीवर में किया जाए।
-सभी घरों व व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को सीवर या सेप्टिक टैंक से जोडऩा जरूरी।
-ब्लैक वाटर का नियमानुसार संग्रहण व निपटान, अपशिष्ट जल व सीवेज उपचार सुविधाओं की पर्याप्त क्षमता होना जरूरी।
-शहर के कम से कम दस फीसदी अपशिष्ट जल को फिर से उपयोग लायक बनाना।
-तीन साल में एक बार सेप्टिक टैंकों को मशीनोंं से खाली कराना।
-सामुदायिक और सार्वजनिक शौचालयों व यूरिनल्स की व्यवस्था करनी होगी।
-सभी रहवासी संघों द्वारा निर्मित सामुदायिक व सार्वजनिक शौचालयों के स्ट्रक्चरल ऑडिट।
-नगर निगम द्वारा निर्मित 25 फीसदी शौचालयों में गाइडलाइन के मुताबिक व्यवस्थाएं की जाएं।
-निर्माण साइट्स पर 25 से अधिक कर्मचारी हैं तो उनके लिए शौचालय की व्यवस्था।
-सभी व्यावसायिक क्षेत्रों में एक किमी के दायरे में सार्वजनिक शौचालय होना जरूरी।
नोट: इन बिंदुओं के अनुसार शहरवासी सुझाव-आपत्तियां दे सकते हैं।
नगर निगम का दावा, पुख्ता हैं व्यवस्थाएं
इस नोटिफिकेशन के बाद शहरवासी क्षेत्र में सीवेज निष्पादन, शौचालय व यूरिनल्स से संबंधित शिकायत नगर निगम में कर सकते हैं। अपर आयुक्त (स्वास्थ्य) राजेश राठौर का कहना है कि वाटर प्लस स्वच्छता मिशन का ही अंग है। इसकी गाइडलाइन के मुताबिक सभी व्यवस्थाएं की गई हैं।
ये है मौजूदा स्थिति
राजधानी की 80 फीसदी कॉलोनियों के पास एसटीपी नहीं हैं। सीवेज खुले में छोडऩे से पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है तो बीमारी फैलती हंै। पुख्ता सीवेज नेटवर्क नहीं होने से घरों व व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से निकलने वाला ग्रे व ब्लैक वाटर फिल्टर नहीं हो रहा। अधिकतर क्षेत्रों में यूरिनल्स व शौचालय की व्यवस्था नहीं है। जहां हैं, वहां पानी की नहीं होने से ये बंद रहते हैं।
Published on:
04 Dec 2019 04:03 am
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