
भोपाल। महानवमीं यानी मां के नौ रूपों की नौ दिन तक चलने वाली पूजा का अंतिम दिन। इस दिन की शुरुआत स्नान, पूजा और फिर षोडषापचार के साथ होती है। इस दिन मां दुर्गा को महिषासुरमर्दिनी के रूप में पूजा जाता है। माना जाता है कि मां दुर्गा ने महिषासुर नामक राक्षस का वध किया था। भारतीय महीने अश्विन में शुक्ल पक्ष के नौवे दिन, महा नवमी मनाई जाती है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह त्योहार सितंबर से अक्टूबर के बीच आता है।
जानें क्या है महानवमीं
महा नवमीं या दुर्गा नवमी का उत्सव बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। माना जाता है कि यह देवी दुर्गा और दुष्ट राक्षस महिषासुर के बीच संघर्ष का अंतिम दिन है। यह देवी दुर्गा का सम्मान करने वाले नौ दिवसीय त्योहार नवरात्रि के समापन का प्रतीक है। महा नवमीं के बाद, भक्त विजयदशमी यानी दशहरा मनाते हैं। इस दिन मां दुर्गा की पूजा करने वाले महिषासुरमर्दिनी की पूजा करते हैं। अष्टमी और नवमीं के समय, देवी चामुंडा ने दुर्गा के तीसरे नेत्र से प्रकट होकर चंदा और मुंडा का वध किया। इस दिन को संधि पूजा के रूप में चिह्नित किया जाता है। इसमें 108 कमल और 108 दीपक जलाए जाते हैं। यह 48 मिनट का समारोह संघर्ष के समापन की याद दिलाता है।
क्या होता है दुर्गा बलिदान
दुर्गा बलिदान की रस्म नवमीं के दिन निभाई जाती है। पहले समय में इसका संबंध पशु बलि से था लेकिन, वर्तमान में लोग पशुओं को माता के मंदिरों में तो ले जाते हैं, लेकिन उनकी बलि नहीं चढ़ाते बल्कि उन्हें मंदिर में लेजाकर ऐसे ही छोड़ आते हैं। वहीं कुछ लोग सब्जियों से सांकेतिक बलि देकर इस रस्म को पूरा करते हैं।
सिंदूर खेला व सिंदूर उत्सव
वहीं दुर्गा बलिदान के अलावा दुर्गा पूजा के इस पर्व में सिंदूर खेला की रस्म भी निभाई जाती है। जो मां की विदाई यानि मां की मूर्ति के विसर्जन से ठीक पहले होती है। इस रस्म को सिंदूर उत्सव भी कहा जाता है। खासतौर से ये उत्सव बंगाल में मनाया जाता है। इस उत्सव में सुहागिनें हिस्सा लेती हैं। शुरुआत मां दुर्गा को पान का पत्ता अर्पित करने से होती है। जिसके बाद मां की प्रतिमा को सिंदूर लगाया जाता है और इस उत्सव की शुरुआत की जाती है। महिलाएं एक दूसरे के गालों पर सिंदूर लगाकार ये खेल खेलती है और एक दूसरे को लंबे सुहाग की शुभकामनाएं भी देती हैं।
मायके से ससुराल के लिए मां को दी जाती है विदाई
दुर्गा पूजा के साथ मान्यता ये जुड़ी है कि इन दिनों मां दुर्गा अपने मायके आती हैं और यहां पर खूब विश्राम करने के बाद दसवें दिन वे ससुराल वापस लौटती हैं। बताया जाता है कि उनके ससुराल जाने के दिन ही सिंदूर खेला होता है।
ऐसे किया जाता है अनुष्ठान
माना जाता है कि महानवमीं का यह अनुष्ठान अष्टमी के अंतिम 24 मिनट और नवमी के पहले 24 मिनट के दौरान किया जाता है। भारत के कई स्थानों में, देवी माँ को पशु बलि के साथ सम्मानित किया जाता है। समय के साथ, यह संस्कार एक कर्मकांड बलिदान के रूप में विकसित हुआ। देवी को बाद में भोग या प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है। इस दिन देवी दुर्गा के नौवें अवतार मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है।
मायके से ससुराल के लिए विदाई
दुर्गा पूजा के साथ मान्यता ये जुड़ी है कि इन दिनों मां दुर्गा अपने मायके आती हैं और यहां पर खूब विश्राम करने के बाद दसवें दिन वे ससुराल वापस लौटती हैं। बताया जाता है कि उनके ससुराल जाने के दिन ही सिंदूर खेला होता है।
दुर्गा पूजा मुहूर्त
महानवमी तिथि और समय महानवमी मंगलवार, 4 अक्टूबर 2022 को होगी। नवमी तिथि 3 अक्टूबर 2022 को शाम 4:37 बजे शुरू होगी। 4 अक्टूबर 2022 को दोपहर 2: 20 बजे नवमी तिथि समाप्त हो रही है।
Published on:
03 Oct 2022 05:42 pm

बड़ी खबरें
View Allभोपाल
मध्य प्रदेश न्यूज़
ट्रेंडिंग
