
Breaking: काम पूरा दाम आधा, निगम घेरकर महिला स्व सहायता समूहों ने खड़े किए हाथ, नहीं उठाएंगे कचरा
भोपाल. चालू शिक्षा सत्र आखिरी दौर में है, इसमें पहली से आठवीं तक के ८२ लाख ९९ हजार छात्र-छात्राओं को ड्रेस दी जाना थी, लेकिन अब तक ५० फीसदी बच्चों तक ही ड्रेस पहुंच पाई है। अब भी करीब ४० लाख बच्चों को ड्रेस का इंतजार है। सरकार ने ३३ जिलों के जिन ५६७२ स्व सहायता समूहों (राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन को यह काम दिया गया है) को ड्रेस सिलने का काम दिया है, वह काम ही नहीं कर पा रहे हैं। इस कारण सत्र खत्म होने को हैं, लेकिन ड्रेस नहीं मिल पाई। पत्रिका की पड़ताल में सामने आया है कि न तो स्व सहायता समूह सक्षम है और न ही इनमें काम करने वाली महिलाएं इतनी ट्रैंड हैं कि वे इतनी ड्रेस सिल सके।
एेसे समझें स्व सहायता समूह व सिलाई करने वाली महिला की क्षमता को
८२ हजार ९९ हजार ७० ड्रेस सिलकर देना है। इस काम के लिए २८ हजार ३०० महिलाएं काम कर रही है। एक महिला को ३ हजार ड्रेस सिलना है। पूरे महीने काम करें तो उसे २५० ड्रेस यानी ९ ड्रेस प्रति दिन सिलना है जो एक ट्रैंड टेलर के लिए असंभव काम है। स्व सहायता समूहों में काम करने वाली महिलाएं तो सिर्फ आजीविका के लिए सामान्य सिलाई-कड़ाई का काम करती है। एेसे में वे न तो ट्रैंड है और न ही इतना काम करने की क्षमता वे रखती है। इसके कारण वे काम के बोझ में दब गई।
बदरंग, छोटी और उधड़ रही सिलाई
हर समूह ने अपने-अपने स्तर पर कपड़ों की खरीदी की। इससे कपड़ों के रंग-गुणवत्ता में भी अंतर आ गया। एक ही जिले के दो स्कूलों के बच्चों की ड्रेस का रंग अलग-अलग हो गया। समूहों को बच्चों का नाम दिया ही नहीं गया। औसत साइज बताकर सिलाई शुरु करवा दी। इसलिए अब जब बच्चों को ड्रेस मिलने लगी तो वह छोटी-बड़ी निकल रही। लडि़यों की ट्यूनिक और लेगिस की सिलाई बेतरतीब हो गई। सिलाई इतनी कमजोर है कि कुछ ही दिनों में सिलाई उधडऩे लगी है। कांच-बटन की गुणवत्ता भी कमजोर होने से बटन टूट रहे हैं।
एडवांस पैसे में दिए फिर भी नहीं मिली ड्रेस
स्कूल शिक्षा विभाग ने सभी स्व सहायता समूहों को एडवांस में पैसा दे दिया। ३३ जिलों की ८२ लाख ९९ हजार ड्रेस के लिए २४९ करोड़ रुपए दिए गए। इसमें से ८० प्रतिशत पैसा सभी को एडवांस में दे दिया गया है। लेकिन अब तक ड्रेस नहीं मिल पाई। अफसरों ने तर्क दिया है कि आचार संहिता के कारण ड्रेस बांटने पर रोक थी। लेकिन सवाल यह है कि आचार संहिता अवधि में ड्रेस की सिलाई पर रोक नहीं थी, फिर भी उस अवधि में सिलाई का काम पूरा नहीं हो पाया।
ये हैं जिम्मेदार
राष्ट्रीय आजीविका मिशन- मिशन के तहत ही सभी समूह काम करते हैं। इन समूहों को आचार संहिता में काम करने का पर्याप्त समय मिला लेकिन अफसरों ने ढीलपोल बरती। मिशन में एलएम बेलवाल सीईओ थे, लेकिन जिनका दिसंबर में रिटायरमेंट था। रिटायरमेंट करीब देख उन्होंने इस काम पर ध्यान नहीं दिया। अब यहां कुछ समय पहले ही अजय कुमार शर्मा सीईओ बने हैं।
राज्य शिक्षा केंद्र- राज्य शिक्षा केंद्र के अफसरों ने लगातार फालोअप नहीं लिया। यहां भी लोकेश जाटव संचालक थे, लेकिन उन्हें हटा दिया गया। बाद में आईरिन सिंथिया जेपी को संचालक बनाया गया। दोनों जगह अफसरों के बदलने के कारण सतत निगरानी नहीं हो पाई।
मैंने अभी तीन दिन पहले ही काम संभाला है। शिकायतों के बारे में हमें याद है। सभी कलेक्टरों को ड्रेस की गुणवत्ता के निर्देश दे रखे हैं। वे गुणवत्ता नियंत्रण कर भी रहे हैं।
अजय कुमार शर्मा, सीईओ, मप्र राज्य आजीविका मिशन
Published on:
02 Feb 2019 08:28 am
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