
भोपाल। अब आदिवासी चित्रकला को दुपट्टों-साड़ियों पर उकेरने की तैयारी है। डिंडौरी जिले में स्व सहायता समूह एवं फेडरेशन इसकी पहल कर रहा है। इसके जरिए आदिवासी समुदाय की गोंड चित्रकला को दुपट्टे और साड़ियों पर प्रिंट कर उन्हें बेहतर पैकेजिंग और मार्केटिंग के जरिए बाजार में लाया जा रहा है। साथ ही भील, बैगा और उरांव जनजाति की विशिष्ट चित्रकला को भी कपड़ों पर उकेरने की तैयारी है। इसके अलावा वुड आर्ट, मेटल आर्ट, क्ले आर्ट और बैंबू आर्ट को बेहतर बाजार मुहैया कराने के लिए अहमदाबाद स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन डिजाइनिंग के साथ वर्कशॉप आयोजित करने की योजना है। हालांकि कोरोना संक्रमण की वजह से इसमें दो साल की देरी हुई है ।
स्वतंत्रता आंदोलन की थीम पर होगी वर्कशॉप
स्वतंत्रता स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाने वाले आदिवासी आंदोलन वर्ग के क्रांतिकारियों के बलिदान और उनकी गाथा से सभी की थीम को रूबरू कराने के उद्देश्य से वर्कशॉप कराने की योजना पर होगी है। इसमें आदिवासी चित्रकला में कलाकार सेनानियों के वर्कशॉप संघर्ष और उनके योगदान को कैनवास पर उकेरेंगे।
खास है चित्रकला
आदिम जाति अनुसंधान एवं विकास संस्था के ज्वॉइंट डायरेक्टर नीतिराज सिंह बताते हैं कि इन चित्रों में चटख रंगों के उपयोग के साथ ही संदेश, जातक कथाएं या धार्मिक रीति रिवाजों को समझाने की काबिलियत कलाकारों में होती है। आदिवासी कला को जन-जन तक पहुंचाने के लिए वर्कशॉप की जाती है
हर चित्र की अलहदा कहानी
भील चित्रकलाः गोहरी, देव घोड़ा, गाय, भगोरिया मेला, बड़वा द्वारा पानी देखना, गोल गधेड़ा, रक्षा बंधन और होली ।
गोंड चित्रकला: बड़ा देव, मोर मोरनी, घुर्री देव, पक्षियों का बसेरा, गौ चारण, ढेकी, कलशा माता, पक्षियों का बसेरा और महुआ वृक्ष आदि।
उरांव चित्रकला : विवाह की तैयारी, चढ़ती मछली और सोहराई पर्व।
बैगा चित्रकलाः बधेसुर देव, देवी पूजन, नृत्य।
Published on:
25 Jan 2022 06:24 pm
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