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5 हजार नाटकों में निभाया था महिला का किरदार, 95 की उम्र में मिला पद्मश्री अवार्ड

रवीन्द्र भवन में नाटक 'भिखारीनामा' का मंचन, पद्मश्री रामचंद्र मांझी इस उम्र में भी निभाते हैं प्रमुख किरदार

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भोपाल

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Manish Geete

Feb 15, 2021

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भोपाल। रवीन्द्र भवन में नाटक 'भिखारीनामा' का मंचन हुआ। भिखारी ठाकुर रंगमंडल, छपरा (बिहार) के कलाकारों जैनेन्द्र दोस्त के निर्देशन में डेढ़ घंटे के नाटक के माध्यम से प्रसिद्ध रंगकर्मी भिखारी ठाकुर के जीवन को मंच पर उतारा। इस नाटक मे भिखारी ठाकुर के जन्म से लेकर उनके नाच पार्टी बनाने तथा बिदेसिया सहित अन्य नाटक रचने तक की कहानी को दिखाया गया है। नाटक का यह आठवां शो है। नाटक में 95 वर्षीय रंगकर्मी पद्मश्री रामचंद्र मांझी ने गायक का किरदार निभाया। 2017 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी मिल चुका है।

पहला रोल ही महिला का मिला था

रामचंद्र बताते हैं कि मैं महज दस साल की उम्र में भिखारी ठाकुर नाच मंडली से जुड़ गया। उस समय मंडली में कोई ऐसा किरदार नहीं था जो मुझे मिलता। उस समय नाटक से पहली दो-तीन गानों पर नृत्य प्रस्तुति होती थी। मुझे भी लड़की बनाकर मंच पर उतारा दिया गया। बड़ा हुआ तो नाटक में भी रोल मिलने लगे, लेकिन हर बार लड़की का ही रोल मिलता था। मैंने इसे ही अपनी पहचान बना लिया। हालांकि कई गांव वाले मुझे पर हंसते भी थे, लेकिन मैंने हमेशा यही माना कि किरदार कोई भी हो, लेकिन इसे सच्चे दिल से निभाना है।

लौंडा नाच की कला ने दिलाई प्रद्मश्री

उन्होंने बताया कि पद्मश्री मिलने की मुझे खुशी तो है लेकिन मैं तो थिएटर पर एक्ट करने पर ही ध्यान देता हूं। दर्शकों की तालियों से ज्यादा मुझे कुछ पसंद नहीं। मैंने एक कार्यक्रम में प्रसिद्ध फिल्म डांसर हेलेन के साथ भी नृत्य किया था, उसमें भी मैं लड़की ही बना था। भोजपुरी फिल्मों में भी लड़की बनकर ही नृत्य किया। अब तक मैं पांच हजार से ज्यादा नाटक कर चुका हूं। कभी ऐसा लगा ही नहीं कि पुरुष पात्र भी निभाना चाहिए। मुझे हमेशा लौंडा नाच शैली में भूमिका निभाना अच्छा आता है। लौंडा नाच बिहार की प्राचीन लोक नृत्यों में से एक है। इसमें लड़का, लड़की की तरह मेकअप और कपड़े पहन कर नृत्य करता है। किसी भी शुभ मौके पर लोग अपने यहां ऐसे आयोजन कराते हैं. हालांकि, आज समाज में लौंडा नाच हाशिए पर है। अब गिने-चुने ही लौंडा नाच मंडलियां बची हैं, जो इस विधा को जिंदा रखे हुए है, लेकिन उनका भी हाल खस्ता ही है।

खुद ही मेकअप कर बन जाता हूं गौर लड़की

मांझी ने बताया कि मेरा रंग काला है। दर्शक काली लड़की को उतना पसंद नहीं करेंगे, इसलिए मंच पर आने से पहले मेकअप कर खुद को गौरा बना लेता हूं। मैं अपना मेकअप भी खुद ही करता हूं। इसके लिए मुर्दा शंख में जड़ी-बुटियों से खुद की मेकअप का सामान तैयार करता हूं। डायरेक्टर जैनेन्द्र बताते हैं कि हम पिछले तीन सालों से इन्हें पद्मश्री दिलाने का प्रयास कर रहे थे। अब भिखारी ठाकुर के समय के चार सदस्य ही ग्रुप में बचे हैं। यहां नाटक करने शिवलाल बारी आए हैं। उनकी उम्र भी 85 वर्ष है। वे भी करीब 4000 से ज्यादा नाटक कर चुके हैं।

यह है कहानी

इस नाटक में भिखारी ठाकुर के जीवन की मुख्यत: चार अवस्थाओं को प्रदर्शित किया गया है। पहली अवस्था यानि बाल्यावस्था में भिखारी ठाकुर के जन्म से ले कर उनके स्कूल जाने, गाय चराने की विभिन्न दृश्यों को गीत-संगीत के साथ प्रस्तुत किया गया है। इसके बाद की कहानी में भिखारी ठाकुर युवावस्था में प्रवेश करते हैं। इस भाग में भिखारी ठाकुर के जातिगत पेशे (बाल काटना, दाढ़ी बनाना, चि_ी नेवतना आदि) के अनुभवों को दिखाया गया है। इसी क्रम में समाज के यजमानी व्यवस्था को भी दिखाया गया है। उसके अगले भाग में भिखारी ठाकुर की शादी तथा रोजी-रोटी के लिए उनके बंगाल विस्थापित होने के दृश्य को दिखाया गया है।