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International Plastic Bag Free Day: पर्यावरण बचाने के लिए 9 सालों से जूट का झोला साथ लेकर जा रहा हूं….

-रोजगार देने के उद्देश्य से बना रहे पेपर बैग्स

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international Plastic Bag Free Day

भोपाल। हर साल 3 जुलाई को अंतर्राष्ट्रीय प्लास्टिक बैग मुक्त दिवस मनाया जाता है। इस दिन को मनाने के पीछे का उद्देश्य यही होता है कि प्लास्टिक प्रदूषण के हानिकारक प्रभाव के बारे में जागरुकता फैलाई जाए, क्योंकि प्लास्टिक पर्यावरण को बहुत ही नुकसान पहुंचाता है। इसी गंभीर समस्या को ध्यान में रखते हुए शहर में कई संस्थाएं और लोग अपने-अपने स्तर पर कार्य कर रहे हैं। कोई अभियान चलाकर लोगों को समझाइश दे रहा है कि पॉलिथीन का इस्तेमाल न करें, तो कोई कपड़े की थैलियां नि:शुल्क बांट रहा है। शहर में ऐसे भी लोग हैं जो पुराने कपड़ों को रिसाइकल कर खूबसूरत थैले बना रहे हैं ताकि लोग उनका इस्तेमाल करें।

अपनी सुविधा और कम कीमतों के कारण प्लास्टिक हमारे दैनिक जीवन में सर्वव्यापी हो गया है। लेकिन यह एक लागत के साथ आता है। हर साल लाखों टन प्लास्टिक कचरा फेंक दिया जाता है, जिसका अधिकांश हिस्सा महासागरों में चला जाता है, और इस प्र₹िया में वन्यजीवों और पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान पहुंचाता है। फिर भी अब तक निर्मित कुल प्लास्टिक का 91% आज तक रीसाइकिल नहीं किया गया है।

9 सालों से जूट का झोला साथ लेकर जा रहा हूं

एकलव्य संस्था के एक्जिक्यूटिव ऑफिसर मनोज निगम बताते हैं, शहर की संस्था मुस्कान बस्ती की महिलाओं को रोजगार देने के उद्देश्य से उनसे पेपर बैग्स बनवाती है। इन पेपर बैग्स का इस्तेमाल एकलव्य फाउंडेशन की पहल ’’पिटारा’’ में पिछले 20 सालों से नियमित किया जा रहा है। इसके अलावा पिटारा में पुराने कपड़ों के थैलों का इस्तेमाल भी किया जाता रहा है। व्यक्तिगत तौर पर मैं भी पिछले बीस-बाईस सालों से कपड़े का झोला ही इस्तेमाल करता हूं। कई सब्जी, ठेले वाले बिना मांगे पॉलिथीन देते हैं तो उनको मेरी डांट भी पड़ती हैं। मेरे घर में कचरे के लिए पॉलिथीन का इस्तेमाल नहीं होता, लेकिन पॉलिथीन मिल भी जाए तो उसको कई बार उपयोग किया जाता है। मैं 9 साल से एक जूट का झोला हर जगह साथ लेकर जाता हूं। वह मुझे 2015 के विश्व पुस्तक मेले में मिला था।

हमेशा साथ रहता है कपड़े का झोला

विभिन्न चीजों के संग्रह के लिए मशहूर सुधीर पंड्या भी हमेशा अपने साथ एक थैला जरूर रखते हैं, ताकि कभी अचानक कुछ खरीदना पड़े तो पॉलिथीन में न ले जाना पड़े। वे कहते हैं कि पॉलिथीन का इस्तेमाल पर्यावरण के साथ ही पशुओं को भी नुकसान पहुंचा रहा है। कई बार खाने की वस्तुएं पॉलिथीन में होने के कारण पशु उसे भी खा लेते हैं, इससे वह उनके पेट में चली जाती है, जिससे उनकी जान भी जाती है। अखबारों में कई बार ऐसी खबरें भी देखी गई हैं कि गाय के पेट से ढेर सारी पॉलिथीन निकली। मैं लोगों को भी कपड़े के थैले का इस्तेमाल ही करें।