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इमरजेंसी के बाद पहली बार बने विधायक, इंदिरा बोली- मूंछ वाले रघुवंशी को बनाना मंत्री

इमरजेंसी के बाद पहली बार बने विधायक, इंदिरा बोली- मूंछ वाले रघुवंशी को बनाना मंत्री

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इमरजेंसी के बाद पहली बार बने विधायक, इंदिरा बोली- मूंछ वाले रघुवंशी को बनाना मंत्री

भोपाल. पूर्व मंत्री और अनुशासन समिति के अध्यक्ष हजारी लाल रघुवंशी कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ नेता माने जाते हैं। वे पांच बार विधायक, सालों तक मंत्री और विधानसभा उपाध्यक्ष रहे हैं। मूलत: होशंगाबाद के बनापुरा के रघुवंशी अपने खास अंदाज के कारण पहचाने जाते हैं। चुनाव के दौरान भी उनका अंदाज लोगों को खूब भाता था। उन दिनों टोपी और मूंछें खास पहचान मानी जाती थीं।

हजारी लाल रघुवंशी की काया जरूर बूढ़ी हो गई है, लेकिन उनकी आवाज में वही भारीपन और दबंगता है। हजारी लाल अपनी मूंछों पर ताव देकर हमको अतीत के झरोखे में ले जाते हैं। वे कहते हैं कि स्थानीय स्तर पर लोग उनको हजारी दद्दा कहते हैं। उनकी मूंछें ही उनकी पहचान बन गई थीं। लोग उनको मूंछों वाले दादा कहकर पुकारने लगे थे।

1977 में इमरजेंसी के बाद वे पहली बार विधायक बने और अर्जुन सिंह सरकार में मंत्री भी बनाए गए। उस समय लोगों ने एक नारा भी बनाया था, दादा की बात पर-मुहर लगेगी हाथ पर। रघुवंशी एक अच्छे वक्ता माने जाते हैं, इसलिए बड़ी संख्या में लोग उनको सुनने आते थे। उस वक्त वे एक टोपी पहनते थे, जिसको थ्री नॉट थ्री कहा जाता था।


धीरे-धीरे टोपी उनकी पहचान भी बन गई और मुसीबत भी। जब पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की अस्थियां नर्मदा में विसर्जन के लिए होशंगाबाद लाई गईं तो रघुवंशी उनको विसर्जित करने के लिए रास्ते से गुजर रहे थे। लोगों ने कहा कि वो देखो थ्री नॉट थ्री, उस दिन उनको इतना गुस्सा आया कि वे जवाहर लाल नेहरू की अस्थियों के साथ अपनी टोपी को भी नर्मदा में विसर्जित कर आए।

अतीत का झरोखा: कांग्रेस अर्जुन को हटाकर सिंधिया को बनाना चाहती थी सीएम

भोपाल. देश में व्यवस्था भले ही लोकतंत्र की हो, लेकिन प्रदेश की राजनीति की कहानी कुछ और ही कहती है। प्रदेश में कई बार दबाव की राजनीति ने तय फैसले बदलवा दिए। प्रदेश में ऐसा चार बार हुआ, जब हालात ने अचानक किसी और माथे पर राजयोग लिख दिया। एक बार माधवराव सिंधिया की जगह मोतीलाल वोरा का राजतिलक हुआ तो कभी शिवभानु सिंह सोलंकी की जगह अर्जुन सिंह मुख्यमंत्री बन गए।

अर्जुन को हटाकर सिंधिया को कमान सौंपना तय

राजनीतिक विश्लेषक शिवअनुराग पटैरिया के मुताबिक बात दिसंबर 1988 की है। दिल्ली ने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को हटाकर माधवराव सिंधिया को कमान सौंपना तय कर दिया था। माखनलाल फोतेदार, बूटा सिंह और गुलाम नबी आजाद को केंद्रीय पर्यवेक्षक बनाकर भोपाल भेजा गया। सीएम हाउस में विधायक दल की बैठक हुई, जिसमें केंद्रीय पर्यवेक्षक मौजूद थे।

वोरा जनवरी 1989 में मुख्यमंत्री बने

कांग्रेस के अर्जुन सिंह समर्थक विधायक हरवंश सिंह के बंगले पर इक_े हुए थे। विधायक दल की बैठक से बाहर निकले केंद्रीय पर्यवेक्षकों से जब सवाल पूछा गया कि कौन बना मुख्यमंत्री तो उन्होंने कहा दुर्ग में मोती। खबर बाहर निकली तो पता चला कि हाईकमान को विधायकों के दबाव में अपना फैसला बदलना पड़ा। विधायकों में विद्रोह की स्थिति थी। इस तरह मोतीलाल वोरा जनवरी 1989 में मुख्यमंत्री बने।

शिवभानु के लिए कुर्सी, बैठ गए अर्जुन
पटैरिया के मुताबिक 1980 में अर्जुन सिंह, शिवभानु सिंह सोलंकी और कमलनाथ सीएम पद के उम्मीदवार थे। वोटिंग हुई तो सबसे ज्यादा वोट सोलंकी को मिले। उनके बाद अर्जुन सिंह और तीसरे नंबर कमलनाथ रहे। तब ये चर्चा थी कि अर्जुन ने पहले ही मेनका गांधी की मां अमिता आनंद को मैनेज कर लिया था।

हाईकमान के फैसले के मुताबिक कमलनाथ ने अपना समर्थन उनको दे दिया, जिससे शिवभानु सिंह पिछड़ गए और अर्जुन सिंह मुख्यमंत्री बन गए। यहां पर हाईकमान के दबाव में विधायकों का फैसला बदल दिया गया। विधायकों में विद्रोह की स्थिति थी।