रातापानी में कारकास यूटिलाइजेशन प्लांट...
भोपाल। रातापानी टाइगर रिजर्व में मृत पशुओं के सड़े-गले अंग निकालने के लिए लगाए गए कारकास यूटिलाइजेशन प्लांट से वन्यप्राणियों के बीमार और नर्मदा के प्रदूषित होने का खतरा पैदा हो गया था। उसे हटाने के एवज में पशुधन एवं कुक्कुट विकास निगम पांच करोड़ रुपए और 33 एकड़ जमीन मांग रहा है। जबकि, यह यूनिट अवैध रूप से चल रही थी। इसकी जमीन को लेकर वन और पशुपालन विभाग आमने-सामने आ गए हैं। वन विभाग यह जमीन अपनी बताते हुए कई बार बेदखली के नोटिस भी जारी कर चुका है।
रातापानी को 1976 में वन्य अभ्यारण्य का दर्जा मिला, जिसे एनटीसीए ने 2013 में बाघ अभ्यारण्य का दर्जा दिया। यहां लगभग 35 बाघ हैं। रातापानी के देलावाड़ी में 1953 में भारत सरकार ने गौसदन स्थापित किया था, जिसे 1969 में प्रदेश के पशुपालन विभाग को सौंप दिया गया। इसके बाद पशुधन एवं कुक्कुट विकास निगम ने 1995 में यहां कारकास यूटिलाइजेशन प्लांट लगा दिया। यह प्लांट 2007 में बंद हो गया, लेकिन २०१३ में तत्कालीन पशुपालन मंत्री कुसुम मेहदेले ने इसे फिर से चालू करवा दिया। 2013 में पशुधन एवं कुक्कुट विकास निगम ने इस प्लांट को निजी हाथों मंे सौंपने के लिए टेंडर भी निकाला था। मेहदेले ने इस प्लांट से किसी भी प्रकार से वन्यप्राणियों में संक्रमण न होने की दलील भी दी थी। जबकि वन विभाग लगातार कहता रहा है कि प्लांट पूरी तरह है अवैध है और इससे वन्यप्राणियों को खतरा है।
कारकास यूटिलाइजेशन यूनिट से प्रदूषण
वन विभाग ने 2014 में पशुधन एवं कुक्कुट विकास निगम को भेजी रिपोर्ट में लिखा है कि रातापानी बाघ अभ्यारण्य में स्थापित कारकास यूटिलाइजेशन यूनिट में मृत एवं सड़े-गले पशुओं को लाया जाता है। उनके अंग निकाले जाते हैं। इस यूनिट के पास ही भादनेर नदी है, जो आगे जाकर नर्मदा में मिलती है। इस यूनिट का प्रदूषित पानी भादनेर में जाता है और इससे नर्मदा भी प्रदूषित हो रही है। इसके साथ ही मृत पशुआें के अवशेष यहां-वहां फैले पड़े हैं। इससे वन्यप्राणियों में संक्रमण फैल रहा है। वहीं, वायु प्रदूषण भी हो रहा है।
रातापानी टाइगर रिजर्व में आ जाने के कारण वन विभाग ने वहां से कारकास यूटिलाइजेशन प्लांट हटाने के लिए पशुपालन विभाग को कहा है। हमने होशंगाबाद कलेक्टर से दूसरी जगह जमीन मांगी है।
- अजीत केसरी, प्रमुख सचिव, पशुपालन
यह पूरी तरह से अपराध। वन्यप्राणी अधिनियम का उल्लंघन है। पहले तो इस प्लांट के जरिए वन क्षेत्र में प्रदूषण किया गया और अब पशुपालन विभाग हर्जाने में जमीन और पैसा मांग रहा है। इसकी जगह इस मामले की जांच कराकर उन लोगों पर कार्रवाई होना चाहिए, जिन्होंने इस प्लांट के लिए जिम्मेदार थे।
- अजय दुबे, वन्यप्राणी आरटीआई कार्यकर्ता
रिपोर्ट -आलोक पांडेय