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रोज मॉनिटरिंग का दावा, डिहाइड्रेशन से मौत होने में लगते हैं तीन दिन, दल को पता ही नहीं चला

कूनो में दो और चीता शावकों की मौत, शेष एक की हालत स्थिर, तीन दिन में तीन शावकों की मौत, अब कूनो में 2 माह में कुल छह मौत

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भोपाल। कूनो नेशनल पार्क से गुरुवार की दोपहर फिर एक बुरी खबर आई, जिसमें दो और चीता शावकों की मौत हो गई, वहीं अब शेष बचे एक शावक की भी हालत स्थिर बताई जा रही है। ये तीनों शावक 23 मई से ही बीमार बताए जा रहे हैं। इससे पहले 23 मई की सुबह एक शावक की मौत हो गई है। इस प्रकार 3 दिन में 3 शावकों की मौत हो गई, जबकि 60 दिन में कूनो में कुल छह (3 वयस्क, 3 शावक) मौत हो चुकी है। अब कूनो में 17 वयस्क और एक शावक रह गया है।

कूनो, गांधी सागर से लेकर मुकुंदपुरा तक बेहद गर्मी वाले इलाके

इनक्लोर में इंतजाम का दावा फिर भी डिहाइड्रेशन से मौत पर उठे सवालभोपाल। कूनो नेशनल पार्क में मादा चीता ज्वाला की तीन शावकों की मौत के बाद मॉनिटरिंग व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं। कूनो प्रबंधन का दावा है कि टीम लगातार चीता-शावकों की मॉनिटरिंग करती है। एक्सपट्र्स का कहना है कि गंभीर डिहाइड्रेशन की स्थिति में पहुंचने में दो से तीन दिन का समय लगता है। यदि बच्चे ठीक से मां का दूध पीते हैं तो ऐसी स्थिति नहीं बनती। इसके बाद भी डिहाइड्रेशन होता है तो उपचार के लिए दो से तीन दिन का समय होता है। शुरुआती दौर में टीम को इसका पता कैसे नहीं चल पाया।

प्रोजेक्ट पर अब तक 10 करोड़ से ज्यादा खर्च

इनक्लोजर में बने हैं छोटे पोंडकूनो में मादा चीता अपने शावकों के साथ रह रही है, उनमें ही पानी के लिए छोटे-छोटे पोंड बने हुए हैं। साउथ अफ्रीका में भी कूनो जैसा ही जंगल है, वहां भी गर्मियों में लगभग इतना ही तापमान रहता है। चीता प्रोजेक्ट के समय भी अधिकारियों को पता था कि कूनो, मुकुंदपुरा से लेकर गांधी सागर तक बेहद गर्म इलाके हैं। इन्हें प्रोजेक्ट के लिए सबसे मुफीद भी माना गया था। इस प्रोजेक्ट पर अब तक 10 करोड़ से ज्यादा खर्च किया जा चुका है।

शुरुआती दौर में ही इलाज मिल जाता तो बच्चों को गंभीर डिहाइड्रेशन नहीं होता

चीता प्रोजेक्ट से जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि मॉनिटरिंग दल से लगातार जांच करता है कि बच्चों का बॉडी वेट कितना है, उनकी ग्रोथ कैसे हो रही है, उन्हें न्यूट्रिशियन की आवश्यकता है या नहीं। यदि शुरुआती दौर में ही इलाज मिल जाता तो बच्चों को गंभीर डिहाइड्रेशन नहीं होता। गर्मी को देखते हुए उन्हें थोड़ी ठंड जगह पहुंचाया जा सकता था। साफ है कि कहीं ना कहीं मॉनिटरिंग व्यवस्था फेल रही है। पीसीसीएफ, वन्य प्राणी जेएस चौहान का कहना है कि चीता और शावकों की लगातार मॉनिटरिंग की जाती है। लापरवाही जैसी कोई बात नहीं है। साउथ अफ्रीका और नामीबिया के एक्सपर्ट की सलाह से ही प्रबंध किए जा रहे हैं।