भोपाल। अपने भाई की कलाई पर राखी बांधने के लिए हर बहन रक्षा बंधन के दिन का इंतजार करती है। श्रावण मास की पूर्णिमा को यह पर्व मनाया जाता है। इस पर्व को मनाने के पीछे कहानियां हैं। यदि इसकी शुरुआत के बारे में देखें तो यह भाई-बहन का त्यौहार नहीं बल्कि विजय प्राप्ति के किया गया रक्षा बंधन है।
पंडित सुनील शर्मा के अनुसार भविष्य पुराण के अनुसार जो कथा मिलती है वह इस प्रकार है। बहुत समय पहले की बाद है देवताओं और असुरों में युद्ध छिड़ा हुआ था लगातार 12 साल तक युद्ध चलता रहा और अंतत: असुरों ने देवताओं पर विजय प्राप्त कर देवराज इंद्र के सिंहासन सहित तीनों लोकों को जीत लिया।
इसके बाद इंद्र देवताओं के गुरु, ग्रह बृहस्पति के पास के गए और सलाह मांगी। बृहस्पति ने इन्हें मंत्रोच्चारण के साथ रक्षा विधान करने को कहा। श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन गुरू बृहस्पति ने रक्षा विधान संस्कार आरंभ किया। इस रक्षा विधान के दौरान मंत्रोच्चारण से रक्षा पोटली को मजबूत किया गया।
पूजा के बाद इस पोटली को देवराज इंद्र की पत्नी शचि जिन्हें इंद्राणी भी कहा जाता है ने इस रक्षा पोटली के देवराज इंद्र के दाहिने हाथ पर बांधा। इसकी ताकत से ही देवराज इंद्र असुरों को हराने और अपना खोया राज्य वापस पाने में कामयाब हुए।
वर्तमान में यह त्यौहार बहन-भाई के प्यार का पर्याय बन चुका है, कहा जा सकता है कि यह भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को और गहरा करने वाला पर्व है। एक ओर जहां भाई-बहन के प्रति अपने दायित्व निभाने का वचन बहन को देता है, तो दूसरी ओर बहन भी भाई की लंबी उम्र के लिये उपवास रखती है।
इस दिन भाई की कलाई पर जो राखी बहन बांधती है वह सिर्फ रेशम की डोर या धागा मात्र नहीं होती बल्कि वह बहन-भाई के अटूट और पवित्र प्रेम का बंधन और रक्षा पोटली जैसी शक्ति भी उस साधारण से नजर आने वाले धागे में निहित होती है।
वर्ष 2017 में शुभ महूर्त...
रक्षा बंधन तिथि - 07 अगस्त 2017,सोमवार
अनुष्टान समय - 11:04 से 21:12 (07 अगस्त 2017)
अपराह्न मुहूर्त - 13:46 से 16:24 (07 अगस्त 2017)
प्रदोष समय रक्षा बंधन मुहूर्त - 19:03 बजे से 21:12 (07 अगस्त 2017)
पूर्णिमा तिथि प्रारंभ - 22:28 बजे (06 अगस्त 2017)
पूर्णिमा तिथि समाप्त - 23:40 बजे (07 अगस्त 2017)
भद्रा समाप्ति समय - 11:04 बजे (07 अगस्त 2017)
दरअसल श्रावण मास को भगवान शिव की पूजा का माह मानते हुए धार्मिक रुप से बहुत महत्व दिया जाता है। चूंकि
रक्षाबंधन श्रावण पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है इसलिये इसका महत्व बहुत अधिक हो जाता है। आइये जानते हैं रक्षांधन के धार्मिक महत्व को बताने वाले अन्य पहलुओं के बारे में।
धार्मिक एवं पौराणिक ग्रंथों में उल्लेखरक्षाबंधन के त्यौहार की उत्पत्ति धार्मिक कारणों से मानी जाती है जिसका उल्लेख पौराणिक ग्रंथों में, कहानियों में मिलता है। इस कारण पौराणिक काल से इस त्यौहार को मनाने की यह परंपरा निरंतरता में चलती आ रही है।
चूंकि देवराज इंद्र ने रक्षासूत्र के दम पर ही असुरों को पराजित किया, चूंकि रक्षासूत्र के कारण ही माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को राजा बलि के बंधन से मुक्त करवाया, महाभारत काल की भी कुछ कहानियों का उल्लेख
रक्षाबंधन पर किया जाता है अत: इसका त्यौहार को हिंदू धर्म की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।
उपाकर्म संस्कार और उत्सर्ज क्रिया
श्रावण पूर्णिमा यानि
रक्षाबंधन के दिन ही प्राचीन समय में ऋषि-मुनि अपने शिष्यों का उपाकर्म कराकर उन्हें विद्या-अध्ययन कराना प्रारंभ करते थे। उपाकर्म के दौरान पंचगव्य का पान करवाया जाता है तथा हवन किया जाता है। उपाकर्म संस्कार के बाद जब जातक घर लौटते हैं तो बहनें उनका स्वागत करती हैं और उनके दांएं हाथ पर राखी बांधती हैं। इसलिये भी इसका धार्मिक महत्व माना जाता है। इसके अलावा इस दिन सूर्य देव को जल चढाकर सूर्य की स्तुति एवं अरुंधती सहित सप्त ऋषियों की पूजा भी की जाती है इसमें दही-सत्तू की आहुतियां दी जाती हैं। इस पूरी क्रिया को उत्सर्ज कहा जाता है।
चूंकि इस दिन का बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधने के लिये साल भर इंतजार करती हैं इसलिये इसकी तैयारी भी वे पूरे जोर-शोर से करती हैं। बहनों में इस दिन गजब का उल्लास देखने को मिलता है। अपने भाई के हाथ पर राखी बांधे बिना अन्न का निवाला तक ग्रहण नहीं करती। वे प्रात: साफ सफाई कर घर में सजावट करती हैं।
स्नान-ध्यान कर अगरबत्ती व धूप जलाती हैं एवं स्वादिष्ट व्यंजंन बनाती हैं। फिर फल, फूल, मिठाई, रोली, चावल और राखी एक थाल में रखकर उसे सजाती हैं। इसके बाद शुभ मुहूर्त के समय अपने भाई की लंबी उम्र और मुसीबतों से भाई की रक्षा की कामना करते हुए दायें हाथ पर राखी बांधती हैं। बदले में भाई भी अपनी बहन को हर संभव सुरक्षा का वचन देता है। वर्तमान में तो भाई कीमती भेंट भी बहनों को देते हैं।