
रामनामी समुदाय के सदस्य
भोपाल। हम सब अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र भगवान राम की आराधना करते हैं लेकिन छत्तीसगढ़ में एक समुदाय ऐसा भी है जो अपने शरीर में 'राम' का नाम गुदवा लेता और उपासना निराकर राम की करता है। भारत सरकार की फिल्म्स डिवीजन, मुंबई के लिए सुनिल शुक्ल निर्देशित फिल्म 'रामराम' में इस निराकार राम की अवधारणा, मान्यता और रीति रिवाज को तफसील से दिखाया गया है। इस डॉक्यूमेंट्री फिल्म का विशेष प्रदर्शन रविवार को मानव संग्रहालय में किया गया।
हर साल लगता है रामनामियों का मेला
सुनिल ने बताया कि 52 मिनट की इस फिल्म में रामनामी समुदाय के रीति रिवाज़, संस्कृति और परम्परा को विस्तार से दिखाया गया है। डॉक्यूमेंट्री फि़ल्म की शूटिंग के लिए अक्सर छत्तीसगढ़ जाना होता था। एक बार ट्रेवल करते समय कुछ ऐसे लोग नजर आए जिनके शरीर पर 'रामराम' गुदा था। मैंने इनकी तलाश की फिर इनके सम्बन्ध में चौमासा में सतीश जायसवाल का लेख मिला। मुझे लगा कि इस पर फिल्म बनाई जाना चाहिए। रामनामी समुदाय से सम्बंधित ये पहला प्रमाणित विज़ुअल डॉक्यूमेंटेशन है। फिल्म की शूटिंग जांजगीर चाँपा, बिलासपुर, रायगढ़, सारंगगढ़, सक्ती, बिलाईगढ़, सरसींवा और रायपुर में की गई। ये समुदाय ज्यादातर महानदी के तट पर शिवरी नारायण मंदिर के आसपास केंद्रित है। जांजगीर चांपा जिले के पिरदा गांव में रामनामियों का सौवां सालाना मेला था जो तीन दिन आयोजित किया जाता है। इसे 'बड़ा भजन मेला' कहते हैं। रामनामियों ने यदि अपने संगठन नहीं बनाए हैं फिर भी उनके ऐसे नियम हैं जिन्हें मानना जरूरी है। ये नियम हैं रोज राम-नाम का उच्चारण, सभी सदस्यों से बराबरी से व्यवहार और सम्मान, शराब न पीना, शाकाहार, राम-राम का कम से कम एक गुदना और राम-राम की ओढ़नी का प्रयोग।
अब राजनैतिक पहचान भी बन रही
सरकारी दस्तावेजों में रामनामी खुद को सतनामी ही बताते हैं। रामनामियों की पहचान अब समाजी रूप से अपने आप को व्यक्त करने में झिझकती नहीं और यही वजह है कि अब समाज की राजनीतिक पहचान की इच्छा भी जागने लगी है। उनके प्रतिनिधित्व का दावा करने वाली दो संस्थाएं बन चुकी हैं। एक अखिल भारतीय रामनामी महासभा और दूसरी छत्तीसगढ़ रामनामी सभा। यह भी एक तरह से अपनी पहचान को स्थापित करने की पहल है। जाहिर है मेले भी दो जगहों पर होंगे।
Published on:
11 Apr 2022 12:08 am
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