
reservation in promotion
भोपाल। प्रमोशन में आरक्षण पर मध्यप्रदेश के हाईकोर्ट बड़ा फैसला कर चुका है। इस फैसले ने राज्य सरकार को बड़ा झटका दिया था। कोर्ट ने अहम फैसले में कहा था कि नियुक्ति के समय यदि किसी भी व्यक्ति ने आरक्षण का लाभ ले लिया है, तो पदोन्नति में वह दोबारा आरक्षण का लाभ नहीं ले सकता है।
मध्यप्रदेश के मुख्य न्यायाधीश हेमंत गुप्ता और न्यायाधीश वीके शुक्ला की युगलपीठ ने इस विचार के साथ यह फैसला दिया था। यह फैसला सागर जिले में पदस्थ अतिरिक्त सिविल जज पदमा जाटव की याचिका पर यह कहते हुए दिया गया था कि यह हस्तक्षेप योग्य नहीं है।
mp.patrika.com आरक्षण के मुद्दे पर कोर्ट के दिसंबर 2017 में दिए उस अहम फैसले को रिकॉल कर रहा है, जो आपको जानना चाहिए...।
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हाईकोर्ट में दी थी चुनौती
-मप्र उच्च न्यायिक सेवा में सिविल जज सीनियर डिवीजन परीक्षा 2017 में आरक्षण का लाभ नहीं दिए जाने पर चुनौती दी गई थी।
-इसमें कहा था कि उच्च न्यायालय के प्रिंसिपल रजिस्ट्रार (एग्जाम) ने 61 पदों को प्रमोशन से भरने 24 मार्च 2017 को विज्ञापन निकाला था। इसमें हुई लिखित परीक्षा में जाटव भी शामिल हुईं, लेकिन एक अंक कम होने पर वह इंटरव्यू में नहीं बैठ सकी थीं।
यह भी है खास
-यदि जाटव को रिजर्वेशन का लाभ दे दिया जाता तो उन्हें निश्चित रूप से प्रमोशन मिल जाता।
-यह याचिका दायर करके चयन प्रक्रिया को कटघरे में खड़ा कर दिया गया था।
-सुनवाई के बाद कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि याचिकाकर्ता अनुसूचित जाति वर्ग से है और सिविल जज पर उनकी नियुक्ति आरक्षित सीट पर हुई थी।
आरक्षण का लाभ सिर्फ एक बार
कोर्ट ने यह भी कहा था कि जब एक बार नियुक्ति के वक्त आरक्षण का लाभ लिया गया है, तो ऐसे व्यक्तियों को दूसरी बार आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता। युगल पीठ ने महिला जज की याचिका खारिज कर दी थी।
पदोन्नति में आरक्षण पर आ सकता है ऐतिहासिक फैसला
प्रमोशन में आरक्षण का मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। मध्यप्रदेश की सरकारी नौकरियों में पदोन्नति में आरक्षण के मामले में सुप्रीम कोर्ट में यह अंतिम दौर में है। 11 अक्टूबर 2017 के बाद से रोज सुनवाई चल रही है। माना जा रहा है कि जल्द ही सुप्रीम कोर्ट ऐतिहासिक फैसला दे सकता है।
दिग्विजय सरकार में लागू हुआ था यह नियम
तत्कालीन दिग्विजय सिंह सरकार ने 2002 में प्रमोशन में आरक्षण नियम लागू किया था, जो शिवराज सरकार ने भी लागू कर दिया था, लेकिन इस निर्णय को जबलपुर हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। इस पर एमपी हाईकोर्ट ने 30 अप्रैल 2016 को लोक सेवा (पदोन्नति) नियम 2002 ही खारिज करने का आदेश दिया था। इसके बाद दोनों पक्ष अपने-अपने हक के लिए सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ रहे हैं। मध्यप्रदेश सरकार आरक्षित वर्ग के पक्ष में खड़ी है।
हाईकोर्ट ने कहा था इनसे वापस लें प्रमोशन
जिन्हें नए नियम के अनुसार पदोन्नति दी गई है, मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने सरकार द्वारा बनाए गए नियम को रद्द कर 2002 से 2016 तक सभी को रिवर्ट करने के आदेश दिए थे। मप्र सरकार ने इसी निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पीटिशन (LIP) लगा रखी है।
UP में हो चुके हैं डिमोशन
उत्तरप्रदेश में भी कोर्ट ने पदोन्नति में आरक्षण के फैसले को निरस्त कर दिया था। इसके बाद प्रमोशन में आरक्षण का लाभ लेने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों को वापस बड़े पदों से छोटे पदों पर कर दिया गया।
Published on:
02 Apr 2018 11:41 am
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