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भोपाल. बच्ची को 60 हजार बच्चों में एक को होने वाली दुर्लभ गौचर बीमारी है। यह 11 साल तक पता नही चला, जब पता चला तो माता पिता के होश उड़ गए। इसका एक मात्र इलाज इलाज एआरटी (एंजाइम रिप्लेसमेंट थेरेपी) है। जिसका एक साल का खर्च दो करोड़ रुपए तक आता है। ऐसा इसलिए क्योंकि विदेशों से यह दवा मंगानी पड़ती है। परिवार सभी उम्मीद छोड़ चुका था। मगर पांच साल बाद एम्स भोपाल से उन्हें नई खुशियां मिली। पिछले एक साल से बीमारी से ग्रसित अर्चिता को एम्स में एआरटी फ्री में लग रहा है। जिससे मरीज के स्वास्थ्य में सुधार भी आ रहा है। अर्चिता ने एक वीडियो के माध्यम से इलाज की कहानी बताईं, उनके अनुसार वह देश के बड़े-बड़े संस्थानों में इलाज के लिए गई।
यह है गौचर बीमारी
एम्स के डॉक्टरों के अनुसार गौचर जेनेटिक बीमारी है। ग्लूकोसर ब्राइट एंजाइम (लिपिड) में डिफेक्ट के कारण यह होता है। जिसके कारण स्पलीन और लीवर काफी बढ़ जाता है। हड्डी काफी कमजोर हो जाती है। अकडऩे लगती है। मामूली चोट से भी टूट जाती है। इलाज न मिलने पर मरीज की मौत तक हो सकती है।
प्रदेश में यह है दुर्लभ बीमारियों की स्थिति, एम्स में बनेगा खास सेंटर
दुर्लभ बीमारियों के लिए वर्तमान में पूरे मध्य भारत में कोई विशेष संस्थान व विभाग नहीं है। इन बीमारियों के मरीजों को रोग के हिसाब से अलग-अलग विभाग में इलाज किया जा रहा है। हालांकि राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीती 2021 के परिणाम स्वारूप, प्रदेश का पहला सेंटर ऑफ रेयर डिजीज भोपाल के एम्स अस्पताल में शुरू होने जा रहा है। जिससे इन बीमारियों के इलाज समेत शोध को बढ़ावा मिलेगा। इसके जरिए दवाओं के स्वदेशी अनुसंधान और स्थानीय उत्पादन पर ध्यान बढ़ाना और उपचार की लागत को कम करना शामिल है।
दुर्लभ बीमारियों में 85 फीसदी बच्चे, एक दिन लगती है खास ओपीडी
दुर्लभ बीमारियों की संख्या लगभग सात हजार के करीब है। इनमें से सिर्फ 5 फीसदी रोगों का ही इलाज संभव है। साथ ही इससे ग्रसित लगभग 80 से 85 फीसदी बच्चे होते हैं। इसको देखते हुए एम्स के पिडियाट्रक वार्ड में हर सप्ताह में एक दिन खास क्लीनिक लगाई जाती है।
Published on:
28 Feb 2023 10:09 pm
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