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सावन का महीना : भोपाल के इन शिव मंदिरों का रोचक है इतिहास, जानें FACT

सावन के इस पवित्र महीने में आप भी जानिए इन शिव मंदिरों का रोचक इतिहास। भोजपुर स्थित पूर्व का सोमनाथ कहा जाने वाले शिव मंदिर की ये रोचक बातें नहीं जानते होंगे आप...

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sanjana kumar

Jul 25, 2016

भोपाल। सावन के इस महीने में आज सावन का पहला सोमवार पड़ा है। शहर के लगभग हर शिव मंदिर में भक्तों का जमघट जुटा होगा। पूजा-अर्चना का दौर भी शुरू हो चुुका है, जो शाम तक जारी रहेगा। शहर में भोजपुर के ऐतिहासिक शिव मंदिर और सहित मशहूर गुफा मंदिर, नेवरी, पशुपतिनाथ मंदिर गोविंदपुरा तथा बिड़ला मंदिर के साथ ही गिन्नौरी, बाणगंगा का झरनेश्वर महादेव मंदिर आज सावन के सोमवार के महत्व का उदाहण प्रस्तुत कर रहे हैं।


इन मंदिरों में शिव भक्तों के मेले लगेंगे। कहीं भगवान शिव का दुग्धाभिषेक किया जाएगा, तो कहीं बर्फ के शिवलिंगों की स्थापना की जाएगी। खास तौर पर गुफा मंदिर में शिवालय के गौमुख द्व‌ार को हरियाली का संदेश देने के लिए हरे पत्तों व फूलों से सजाया गया है। अशोका गार्डन स्थित शिव मंदिर, नेहरू नगर स्थित पिपलेश्वर महादेव मंदिर आदि में पार्थिव शिवलिंगों का निर्माण किया जा रहा है। सावन के इस पवित्र महीने में आप भी जानिए इन शिव मंदिरों का रोचक इतिहास। भोजपुर स्थित पूर्व का सोमनाथ कहा जाने वाले शिव मंदिर की ये रोचक बातें नहीं जानते होंगे आप...


* सावन के हर सोमवार को भोजपुर के इस मंदिर में आसपास के ही नहीं बल्कि दूर-दराज से भी भक्त आते हैं।
* हजारों साल पहले राजा भोज द्वारा निर्माणित यह मंदिर तकनीक ही नहीं, बल्कि अपनी वास्तुकला के लिए भी दुनिया भर में जाना जाता है।
* यह मंदिर पूरब का सोमनाथ, तो भोजेश्वर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।
* हालांकि कुछ लोगों की मान्यता है कि यह मंदिर पांडवों ने कुंती के लिए बनवाया था ताकि वे भगवान शिव की पूजा अर्चना कर सकें।



* भोजपुर गांव की एक पहाड़ी पर बने इस मंदिर के परिसर में कई पत्थरों पर बनी कलाकृतियां इसे हजारों साल पहले इंजीनियरिंग की बेहतर वर्कशॉप साबित करने के लिए काफी हैं।
* पत्थरों पर बनी मंदिर की डिजाइन, पत्थरों को काटने की तकनीक और एक सुनिश्चित एंगल पर बनाई गई इसकी रैंप वास्तुकला के नायाब उदाहरण हैं।
* मंदिर के स्तंभ और क्षेत्र के अंदर तथा बाहर की डिजाइन देखकर कोई भी इसकी वास्तुकला देखकर दंग रह जाता है।


* भोजपुर से डेढ़ किलोमीटर पहले मेंदुआ गांव में स्थित जलधारा फैक्ट्री। यहां पहाड़ों पर दर्जनों जलधाराएं कटी हुई हैं, ये भी बेहतर इंजीनियरिंग का अच्छा उदाहरण है।
* मंदिर के पीछे रैंपनुमा एक पहाड़ी है। इसे देखकर लगता है कि इसके निर्माण के लिए यहीं से पत्थर ले जाए जाते थे और लगते जाते थे। जिससे उसका कोण बदलता जाता था।


* मंदिर के डिजाइन और नायाब वास्तुकला के बारे में विशेषज्ञ कहते हैं कि शिवमंदिर का परिसर और पहाड़ी क्षेत्र मंदिर निर्माण की इंजीनियरिंग का शानदार उदाहरण है। पत्थरों को किस तरह काट-काटकर मंदिर में लगाया गया और उसका निर्माण किया गया। यह यहां की चट्टानों और पत्थरों पर साफ नजर आता है। ये पत्थर इसके निर्माण के अवशेष हैं, जो बेहतर इंजीनियरिंग वर्कशॉप की गाथा कहते हैं।
* स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्तमान में भोजपुर नगर को बहुत कम लोग जानते हैं। लेकिन मध्यकाल में इस नगर की ख्याति दूर-दूर तक थी।



* आपने एक प्रसिद्ध लोकोक्ति सुनी होगी 'कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली' वह इस मंदिर का निर्माण करवाने वाले राजा भोज को लेकर ही कही जाती है।
* इस मध्यकालीन नगर भोजपुर को प्रसिद्धि दिलाने का मुख्य श्रेय भोजपुर के इस भोजेश्वर शिव मंदिर और इसके पास से बहती हुई विशाल झील थी।


* वर्तमान में इस मंदिर का निर्माण अधूरा ही है। तो इसके पास से बहने वाली झील भी पूरी तरह से सूख चुकी है।
* यहां स्थापित शिवलिंग की ऊंचाई 7.5 फीट और परिधि 17.8 फीट है, जो स्थापत्य कला का एक बेमिसाल उदाहरण है।


* यह शिवलिंग एक वर्गाकार और विस्तृत फलक वाले चबूतरे पर तीन स्तरीय चूने के पत्थर के पाषाण खंडों पर स्थापित है।
* कहते हैं इस मंदिर का शिखर निर्माण का काम कभी भी पूरा नहीं हो सका, यह आज भी एक रहस्य है। इस पहाड़ी पर इधर-उधर रखी हुई पत्थर की बड़ी-बड़ी शिलाएं इस बात की गवाही देती हैं कि इस शिखर के पूर्ण निर्माण के लिए कई बार प्रयास किए गए, लेकिन इसका निर्माण कभी पूरा नहीं हो सका।

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