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इंसानी खोपड़ी में खाते-पीते हैं कापालिक साधु, जानिए इनसे जुड़े कई रहस्य

इनका नाम इनके व्यवहार से रखा गया क्योंकि यह मानव खोपड़ियों यानी कि कपाल में खाते-पीते हैं।

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Alka Jaiswal

May 02, 2016


उज्जैन। सिंहस्थ में आपको बहुत प्रकार के साधु मिलेगें जिनकी अलग-अलग परंपराएं और साधनाएं सदियों से चली आ रही है। इन्ही में से एक होते हैं कापालिक। इनका जीवन आम साधु-संतों से बहुत अलग होता है। जानकारों की मानें तो कापालिक संप्रदाय के लोग शैव संप्रदाय के अनुयायी माने जाते हैं। इनका नाम इनके व्यवहार से रखा गया क्योंकि यह मानव खोपड़ियों यानी कि कपाल में खाते-पीते हैं।

माना जाता है कि यह संप्रदाय तांत्रिको का होता है। कापालिक हमेशा मानव खोपड़ी को अपने पास ही रखते हैं जिससे कि उन्हें हमेशा याद रहे कि उनका यह शरीर नश्वर है और उनकी वैराग्य की भावना और दृढ़ हो। इसके साथ ही उन्हें मानव खोपड़ी साथ में रखने से ये याद रहता है कि मृत्यु के बाद इंसानी खोपड़ी और मिट्टी में कोई फर्क नहीं रह जाता है। शायद यही वजह है कि कापालिक जीवन और मृत्यु में कोई फर्क नहीं समझते हैं। वह दोनों को एक समान ही मानते हैं।

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अगर हम इतिहास में देखें तो उस समय कापालिक साधु सबसे कठोर तपस्या करने वाले माने जाते थे। आज भी वह मंत्र, साधना और तप से ही मोक्ष की प्राप्ति करते हैं। ज्यादातर यह कापालिक कुंभ और सिंहस्थ में ही नज़र आते हैं। अगर कोई व्यक्ति कापालिक बनना चाहता है तो वह दुनिया के सभी ऐश-ओ-आराम और अपने परिवार से संन्यास ले लेता है और दोबारा कभी मुड़कर उनकी तरफ नहीं देखता।

कापालिक साधुओं की ये विशेषता बताई जाती है कि अगर आपको कोई असली कापालिक साधु मिल जाता है और वो आपसे खुश हो जाता है तो वह आपके सारे दुख, आपकी सारी बीमारियां खुद पर ले लेता है और तपस्या करके इनको नष्ट कर देता है।

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