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महाराष्ट्र में है शिवराज मामा का एक दीवाना, हर साल जन्म दिन पर शिवराज देने जाते हैं ‘गिफ्ट’

शिंगणापुर में है शिवराज सिंह चौहान के एक खास प्रशंसक, गन्ने के रस से भी मीठी है यह दोस्ती, हर साल पूर्व मुख्यमंत्री के साथ मनाते हैं अपना जन्मदिन, मुरीद ऐसे कि दुकान का नाम रख लिया "मामा रसवंती"

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भोपाल

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Manish Geete

Jan 01, 2024

मध्यप्रदेश की लाड़ली बहनों के साथ महाराष्ट्र का एक भाई भी शिवराज सिंह चौहान का प्रशंसक है। शिंगणापुर के कैलाश आव्हाड़ शिर्डी-शिंगणापुर मार्ग पर 'मामा रसवंती' नाम से गन्ने के रस की दुकान चलाते हैं। 15 साल पहले शिंगणापुर से शिर्डी लौटते हुए बतौर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इनकी दुकान पर रुके और गन्ने का रस पीया। तब तक उन्होंने कभी शिवराज सिंह को देखा भी नहीं था। फिर व्यक्तिगत मुलाकात के बाद वह शिवराज के मुरीद हो गए।

मध्यप्रदेश से करीब 500 किलोमीटर दूर बने इस रिश्ते की कहानी बड़ी रोचक है। सिक्योरिटी और प्रोटोकॉल से जब पता चला कि यह शिवराज सिंह चौहान हैं, तब उन्होंने पहली बार जाकर व्यक्तिगत मुलाकात की। अपनी तरफ से पहल करते हुए साथ में फोटो खिंचवाया और यह भी बताया कि आज मेरा जन्मदिन है। कैलाश को इस बात का जरा भी अंदाज नहीं था कि रिटर्न गिफ्ट में जीवनभर की दोस्ती मिल जाएगी!

कैलाश बताते हैं, "शिवराज जी हर बार गर्व से कहते हैं, नए साल में आपके हाथ से गन्ने का जूस पीकर सालभर ऊर्जावान बना रहता हूं! आपका प्रेम भी ऐसा है कि मुझे हर साल यहां खींच लाता है!" इसके बाद कैलाश ने भी अपना जन्मदिन 31 दिसंबर की बजाए 1 जनवरी को मनाना शुरू कर दिया। पूरा परिवार दिसंबर के आखिरी सप्ताह से ही शिवराज सिंह चौहान के आगमन की तैयारी में जुट जाता है। भले ही शिवराज सिंह चौहान उनके साथ साल के 2 घंटे ही बिताते हैं, लेकिन यह परिवार 2 महीने पहले से तैयारी शुरू कर देता है। हर साल जन्मदिन के उत्सव के साथ केक कटता है और ढेर सारी मीठी यादों के साथ फिर अगले साल का इंतजार शुरू हो जाता है।

उल्लेखनीय है कि शिवराज सिंह चौहान लंबे समय से नए वर्ष की शुरुआत शिर्डी साईबाबा के दर्शन से करते हैं। इसके बाद शिंगणापुर में शनिदेव की पूजा-अर्चना भी करते हैं। यह क्रम पिछले कई सालों से लगातार बना हुआ है।

 

प्रगतिशील किसान हैं कैलाश

गन्ने की खेती के साथ गुड़ का कारोबार करने वाले 44 वर्षीय कैलाश अब ऑर्गेनिक के साथ डायबिटीज के मरीजों के लिए स्पेशल गुड़ भी बनाते हैं। महाराष्ट्र के अलावा मध्य प्रदेश, गुजरात, दिल्ली और उत्तर प्रदेश में इनके गुड़ को खूब पसंद किया जाता है। दक्षिण भारत से भी इस इलाके में दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालु इसी गुड़ के प्रशंसक हैं। गन्ने की खेती के साथ गुड़ की कई खूबियां इनके परिवार की परंपरागत पहचान है। पिता से सीखी तकनीक को अब कैलाश के पुत्र भी इसी कुशलता से आजमा रहे हैं।

 

 

बहुत खास हैं इस इलाके में गन्ने की दुकानें

शनि शिंगणापुर में आस-पास के खेतों से ताजा गन्ने रस बेचने वाले कई स्टॉल हैं। खास बात यह भी है कि अभी भी कुछ दुकानों पर बैल की मदद से पत्थर दबाने की पुरानी तकनीक का उपयोग किया जा रहा है! जब बैल घूमते हैं, तो पत्थरों के दबाव से गन्ने से रस निकलता है। पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए कई स्टालों को रंगीन गुब्बारों से खूबसूरती से सजाया जाता है। कुछ में चारपाई बिछी होती है, कुछ स्टालों में लकड़ी के तख्ते और पुराने साइकिल के टायरों से बने झूले लगे होते हैं।