
सतना/भोपाल। शारदीय नवरात्रि उत्सव की धूम देशभर में देखी जा सकती है। तो मध्यप्रदेश में भी कहीं झांकियों का निर्माण अपने अंतिम चरण में हैं, तो कहीं डांडिया और गरबा का अभ्यास पूरा हो चुका है। वहीं माता रानी के मंदिरों में भी नवरात्रि के कार्यक्रमों के आयोजनों की सूची तैयार की जा चुकी होगी। कहीं जागरण होगा, तो कहीं पाठ। ऐसे में प्रदेश के सतना जिले में स्थित मैहर नगर का नाम न आए, ऐसा कैसे हो सकता है। यहां से 5 किलोमीटर की दूरी पर घने जंगलों की खूबसूरत हरियाली के बीच ऊंची त्रिकूट पहाड़ी पर माता रानी का मंदिर दुनिया भर के श्रद्धालुओं की आस्था केंद्र है। माना जाता है कि यहां आकर माता रानी के दर्शनमात्र से ही मन की मुरादें पूरी हो जाती हैं। यही नहीं कई रहस्यमयी चमत्कारों की गवाही देता मैहर का यह शारदा माता का मंदिर अपने में ही एक रोचक कहानी समेटे है। आप भी जानिए माता का ऐसा रूप जिसके बारे में यही सुना है कि दुनिया के किसी मंदिर की मूरत में इतना तेज नहीं मिलता...
जानें रोचक इतिहास
सतना जिले के मैहर नगर से 5 किलोमीटर की दूरी पर 600 फुट की ऊंचाई पर स्थित त्रिकूट पर्वत को मैहर देवी का मंदिर कहा जाता है। मंदिर के जानकार बतातें हैं कि 200 से 250 वर्ष पहले मैहर में महाराज दुर्जन सिंह जूदेव राजा हुआ करते थे। उन्हीं के राज्य का एक ग्वाला गाय चराने के लिए जंगल में जाया करता था। तब के घनघोर और वीरान जंगल में दिन में भी रात जैसा अंधेरा छाया रहता था। जंगली जानवरों और अन्य जीवों की डरावनी आवाजें आया करती थीं। एक दिन उसने देखा कि उसकी गायों के बीच एक सुनहरी गाय भी चर रही है। लेकिन गौधुलि बेला में वह अचानक कहीं चली गई। दूसरे दिन जब वह इस पहाड़ी पर गायें लेकर आया तो देखता है कि फिर वही गाय इन गायों के साथ मिलकर घास चर रही है।
पीछे गया और बैठ गया गुफा के बाहर
तब उसने निश्चय किया कि शाम को जब यह गाय वापस जाएगी, तब उसके पीछे-पीछे जाएगा। गाय का पीछा करते हुए ग्वाले ने देखा कि वह ऊपर पहाड़ी की चोटी में स्थित एक गुफा में चली गई और उसके अंदर जाते ही गुफा का द्वार बंद हो गया। ग्वाला बेचारा गाय के इंतजार में गुफा के द्वार पर बैठ गया। उसे पता नहीं कि कितनी देर बाद गुफा का द्वार खुला। लेकिन उसे वहां एक बूढ़ी मां दिखाई दी।
गाय चराने के बदले बूढ़ी मां ने दिए ज्वार
तब ग्वाले ने उस बूढ़ी मां से कहा कि 'माई मैं आपकी गाय चराता हूं, इसलिए मुझे पेट के वास्ते कुछ मिल जाए। मैं इसी इच्छा से आपके द्वार पर आया हूं।' बूढ़ी मां अंदर गई और लकड़ी के सूप में जौ के दाने लेकर आई और उस ग्वाले को दे दिए। मां ने उससे कहा, 'अब तू इस भयानक जंगल में अकेले न आया कर।' ग्वाला बोला, 'मां मेरा तो काम ही है जंगल-जंगल गाय चराना। लेकिन मां आप इस भयानक जंगल में अकेली रहती हैं, क्या आपको डर नहीं लगता।
ऊंचे पर्वत-पहाड़ ही मेरा घर
बूढ़ी मां हंसी और उस ग्वाले से कहा-'बेटा यह जंगल, ऊंचे पर्वत-पहाड़ ही मेरा घर हैं। मैं यही निवास करती हूं।' इतना कह कर वह गायब हो गई। ग्वाले ने घर वापस आकर जब उस जौ के दाने वाली गठरी खोली, तो वह हैरान हो गया। जौ की जगह हीरे-मोती चमक रहे थे। उसने सोचा कि यह उसके किसी काम के नहीं वह सुबह होते ही महाराजा के दरबार में पेश होकर उन्हें आप बीती सुनाएगा।
मूर्ति स्थापित करने की आज्ञा
दूसरे दिन भरे दरबार में वह ग्वाला अपनी फरियाद लेकर पहुंचा और महाराजा के सामने पूरी बात सुनाई। उस ग्वाले की कहानी सुन राजा दूसरे दिन वहां जाने का ऐलान कर, अपने महल में सोने चले गए। रात में राजा को स्वप्न में ग्वाले की बताई बूढ़ी मां के दर्शन हुए और आभास हुआ कि वह तो आदि शक्ति मां शारदा हैं। स्वप्न में माता ने राजा को वहां मूर्ति स्थापित करने की आज्ञा दी और कहा कि मेरे दर्शन मात्र से सभी की मनोकामनाएं पूरी होंगी।
एक रहस्य है हर रोज होने वाला यह चमत्कार
माना जाता है कि इस मंदिर में हर रोज एक चमत्कार होता है। रात को मंदिर की साफ-सफाई कर पुजारी और उनके सहयोगी घर चले जाते हैं। लेकिन जब वह सुबह लौटकर मंदिर के पट खोलते हैं, तो पूजा-पाठ और आरती का सामान नजर आता है। पहली आरती कौन करता है कोई नहीं जानता। मंदिर में अपनी सेवाएं देने वाले बताते हैं कि दुनिया भर के विशेषज्ञ यहां आकर इस रहस्य की गुत्थी नहीं सुलझा पाए।
आते हैं आल्हा
मान्यता है कि दो वीर योद्धा आल्हा और ऊदल माता के परम भक्त थे वही आज भी हर रोज माता रानी का पूजा-पाठ और आरती करने आते हैं और चले जाते हैं। मान्यता यह भी है कि आल्हा-ऊदल ने 12 साल तक लगातार तपस्या करके माता से अमरत्व का वरदान प्राप्त किया था। दोनों भाइयों ने माता को प्रसन्न करने के लिए भक्ति भाव से अपनी जीभ शारदा को अर्पण कर दी थी, जिसे मां शारदा ने उसी क्षण वापस कर दिया था।
हर मुश्किल से करती हैं रक्षा
सनातन परंपरा में मां शारदा को विद्या, बुद्धि और कला की अधिष्ठात्री देवी के रूप में पूजा जाता है। परीक्षा-प्रतियोगिता की तैयारी में जुटे छात्र मां शारदा का विशेष आशीर्वाद लेने के लिए बड़ी संख्या में यहां पर पहुंचते हैं। मां शारदा की सच्चे मन से पूजा करने वाले साधक को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है और उसकी कभी भी अकाल मृत्यु नहीं होती। मां शारदा की कृपा से वह हमेशा किसी भी प्रकार के भय, रोग आदि व्याधियों से भी बचा रहता है।
पहले चढऩी होती थीं 1001 सीढिय़ां, अब रोप वे भी
करीब 600 फुट की ऊंचाई वाले इस शक्तिपीठ में माता के दर्शन करने के लिए भक्तों को मंदिर की 1001 सीढिय़ां चढऩी पड़ती थीं। लेकिन अब भक्तों की आसानी के लिए रोप वे की व्यवस्था भी यहां है। हालांकि ज्यादातर भक्त आज भी सीढिय़ों से ही मुश्किल भरा सफर तय करके माता रानी के दर्शन करने आते हैं।
ऐसे पहुंचे मैहर के दरबार
फ्लाइट से : मैहर से करीब 135 किमी की दूरी पर स्थित मैहर का सबसे करीबी एयरपोर्ट खजुराहो हवाई अड्डा है, जो एक डोमेस्टिक हवाई अड्डा होने की वजह से देश के कुछ ही महत्वपूर्ण हवाई अड्डों से जुड़ा है। देश के विभिन्न शहरों से फ्लाइट पकड़कर मैहर जाने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं को जबलपुर एयरपोर्ट के लिए फ्लाइट पकडऩी पड़ेगी, जो मैहर से करीब 165 किमी. की दूरी पर स्थित है। यहां से आप बस और टैक्सी के द्वारा मैहर जा सकते हैं। वहीं जबलपुर से ट्रेन की सुविधा भी उपलब्ध है।
ट्रेन से : नागपुर, इंदौर, नई जलपाईगुड़ी, कानपुर, हजरत निजामुद्दीन, हावड़ा, पटना, वाराणसी, अहमदाबाद, मुंबई, बैंगलोर और चेन्नई के साथ देश के कुछ अन्य महत्वपूर्ण शहरों से मैहर रेलवे स्टेशन के लिए ट्रेन की सुविधा है। मैहर रेलवे स्टेशन के लिए ट्रेन ना मिलने पर आप जबलपुर या प्रयागराज रेलवे स्टेशन के लिए ट्रेन पकड़ सकते हैं। बस, टैक्सी या दूसरी ट्रेन पकड़ कर मैहर जा सकते हैं।
मैहर के लिए आपको मध्य प्रदेश राज्य के विभिन्न शहरों से बस की सुविधा मिल जाएगी, लेकिन अगर आप मध्य प्रदेश राज्य से नहीं, बल्कि देश के अन्य राज्यों से संबंध रखते हैं, तो आपको अपने शहर से मैहर के नजदीकी और बड़े शहर प्रयागराज, खजुराहो या जबलपुर के लिए बस पकडऩी होगी। इन तीनों शहरों के लिए आपको बहुत सारे शहरों से बस की सुविधा मिल जाएगी।
बाइक या कार से : मैहर देश के छोटे-बड़े शहरों से सड़क मार्ग के माध्यम से जुड़ा हुआ है। देश के किसी भी पर्यटक को सड़क मार्ग के द्वारा मैहर पहुंचने में कोई भी परेशानी नहीं होती है।
Published on:
23 Sept 2022 11:46 am
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