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विधानसभा चुनाव के स्टार प्रचारक प्रहलाद के घर में ही लगी सेंध

दमोह लोकसभा क्षेत्र में बढ़ी भाजपा की मुश्किलें

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लोकसभा चुनाव 2019

लोकसभा चुनाव 2019

दमोह. सांसद प्रहलाद पटेल विधानसभा चुनाव में स्टार प्रचारक थे, लेकिन कांग्रेस ने उनकी ही सीट में सेंध लगा दी। 2014 के लोकसभा चुनाव में वे दो लाख से भी अधिक वोट से जीते थे। हाल के विधानसभा चुनाव में भाजपा की बढ़त घटकर महज 16 हजार रह गई है। पूर्व मंत्री जयंत मलैया की हार ने पार्टी को बैकफुट पर ला दिया है। हाल ही में पूर्व मंत्री व सांसद डॉ. रामकृष्ण कुसमरिया ने कांग्रेस का हाथ था तो भाजपा और पटेल की मुश्किलें और बढ़ गई हैं।
विधानसभा चुनाव के आंकड़ों को देखें तो भाजपा का मजबूत गढ़ रहे दमोह लोकसभा क्षेत्र में उसकी पकड़ कमजोर हुई है। टिकट बंटवारे को लेकर उपजे असंतोष से दमोह शहर की सीट हार गई। कांग्रेस में भी अंतर्कलह कम नहीं थी, उसके भी बागी चुनाव मैदान में उतरे। असली अंतर बसपा ने एक सीट जीतकर पैदा किया, जो अब कांग्रेस के साथ है। लोकसभा चुनाव से पहले भी यहां एकजुट नहीं दिख रही है।

- सदन से क्षेत्र तक सक्रिय
सांसद पटेल सदन से क्षेत्र तक खासे सक्रिय रहे। लोकसभा में 443 प्रश्न पूछे और 180 डिबेट में हिस्सा लिया। 12 प्राइवेट बिल भी लाए। रुक्मिणी प्रतिमा और उड़द का मामला उठाया। गौ-अभ्यारण व भारत-तिब्बत सीमा पुलिस प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना ही है। युवाओं को रोजगार मुहैया कराने के लिए उद्योगों की स्थापना का वादा पूरा नहीं हुआ। गोद लिए गए जागेश्वरनाथ तीर्थ स्थल बांदकपुर के अव्यवस्थित विकास से लोगों में नाराजगी है। तीन संसदीय क्षेत्रोंं के बीच एक मेडिकल कॉलेज की स्थापना की केंद्र सरकार की योजना से दमोह वंचित हो गया और सतना ने बाजी मार ली। इसे लेकर भी लोगों में असंतोष है।
- पार्टी का असंतोष सतह पर
मूलत: नरसिंहपुर निवासी प्रहलाद पटेल की सागर संभाग के बड़े नेताओं के साथ बन नहीं पा रही है। नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव और पूर्व मंत्री जयंत मलैया से उनकी अदावत सुर्खियों में रही है। यह अंतर्कलह विधानसभा चुनाव में खुलकर सामने आई, जब कुसमरिया, राघवेंद्र सिंह लोधी और सुनील घुवारा जैसे नेता बगावत पर उतर आए। प्रहलाद के भाई व पूर्व मंत्री जालम सिंह पटेल नरसिंहपुर से चुनाव मैदान में थे, लिहाजा वे अधिकतर समय वहीं रहे। इससे भी पार्टी नेताओं में असंतोष है।
- किसानों की नाराजगी पड़ रही भारी
सागर के तीन, दमोह के चार और छतरपुर के एक विधानसभा क्षेत्र को मिलाकर बनी दमोह लोकसभा सीट में किसानों की नाराजगी भारी पड़ रही है। 2018 में यहां किसानों के कई आंदोलन हुए। एट्रोसिटी एक्ट का भी असर रहा है। बेरोजगारी के मुद्दे पर युवा भी मुखर रहे हैं। हाल ही में केंद्र सरकार के सामान्य वर्ग को आरक्षण देने और किसानों के लिए शुरू की गई प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना को भुनाने में भाजपा जुट गई है। वहीं, कांग्रेस कर्जमाफी के जरिए किसानों को साध रही है। भाजपा को पाकिस्तान के खिलाफ की गई एयर स्ट्राइक से चुनावी लाभ मिलने की आस है।
00 वर्जन...
आदिवासी वर्ग की समस्याओं के प्रति सांसद सक्रिय नहीं रहे। बिजली के मुद्दे व अन्य समस्याओं पर एक भी बार संसद में ध्यान आकृष्ट नहीं कराया है।
- फेरन आदिवासी, पारना
सांसद बड़े नेता माने जाते हैं, लेकिन उन्होंने अपने कद के हिसाब से दमोह की वांछित रेल सुविधाओं का विस्तार नहीं कराया है। अभी भी दक्षिण व नागपुर के लिए दमोह स्टेशन से पांच साल में एक भी ट्रेन नहीं निकल पाई है।
- प्रांजल चौहान, दमोह

दमोह जिले में ही रोजगार के संसाधनों का अभाव है। विकास कार्यों के लिए ठोस योजना नहीं बनी। अगर उद्योग धंधों पर सांसद ध्यान देते तो दमोह की अलग तस्वीर होती। उन्होंने क्षेत्र को निराश किया है।
- रमेश चौहान, दमोह