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खुद की सीटों पर उलझे स्टार प्रचारक, भगवान भरोसे कांग्रेस-भाजपा के उम्मीदवार

खुद की सीटों पर उलझे स्टार प्रचारक, भगवान भरोसे कांग्रेस-भाजपा के उम्मीदवार - विधानसभा जिताने वाले लोकसभा में उलझे    

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भोपाल

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Arun Tiwari

Mar 31, 2019

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भोपाल : प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा में स्टार प्रचारकों का टोटा हो गया है। विधानसभा चुनाव जिताने वाले दोनों पार्टियों के नेता लोकसभा चुनाव में खुद की सीट पर ही उलझ कर रह गए हैं। विधानसभा चुनाव में धूम मचाने वाले मुख्यमंत्री कमलनाथ, महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अब खुद अपनी जीत के फेर में फंस गए हैं।

भाजपा में इसी तरह के हालात हैं। पार्टी के मिस्टर भरोसेमंद पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को प्रदेश के साथ देश की जिम्मेदारी दे दी गई है। प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह और केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर अपनी लोकसभा सीट को ही बचाने में जुटे हुए हैं। ऐसे में कांग्रेस और भाजपा के दूसरे उम्मीदवारों की हालत खराब हो गई है। उनको अब अपनी जीत के लिए भगवान का भरोसा है।

- ये रहे कांग्रेस के स्टार प्रचारक :

- कमलनाथ : विधानसभा चुनाव में अघोषित रुप से मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट रहे कमलनाथ ने पूरे प्रदेश में जमकर प्रचार किया। उनकी रणनीति और चुनावी जमावट ने काम किया और प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बन गई। उन्होंने छह महीने तो प्रदेश में कांग्रेस के चरमराए संगठन को खड़ा करने में लगा दिए। अब वे खुद छिंदवाड़ा सीट से विधानसभा उपचुनाव लड़ रहे हैं वहीं छिंदवाड़ा लोकसभा सीट से उनके पुत्र नकुलनाथ उम्मीदवार होने वाले हैं। ऐसे में कमलनाथ की जिम्मेदारी छिंदवाड़ा में बढ़ गई है।

- ज्योतिरादित्य सिंधिया : कांग्रेस के महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष थे। उन्होंने पूरे प्रदेश में सैकड़ों सभाएं और रोड शो किए। दिन-रात एक कर उन्होंने पूरे प्रदेश को नाप दिया। अब परिस्थितियां बिल्कुल बदल गई हैं। उनको यूपी का प्रभारी बना दिया गया है,उन पर मध्यप्रदेश से ज्यादा उत्तरप्रदेश की जिम्मेदारी आ गई है। गुना सीट से वे खुद भी उम्मीदवार बनने वाले हैं,विधानसभा चुनाव की घड़ी के कांटों ने उनको संकट का अहसास करा दिया है, ऐसे में वे खुद अपनी सीट पर ही उलझे नजर आ रहे हैं।

- दिग्विजय सिंह : विधानसभा चुनाव में समन्वय समिति के मुखिया रहे दिग्विजय सिंह खुद कठिन सीट भोपाल में उलझ गए हैं। उन्होंने प्राथमिकता में राजगढ़ सीट बताई थी लेकिन मुख्यमंत्री ने उनको भोपाल जैसी भाजपा का गढ़ कही जाने वाली सीट थमा दी। दिग्विजय को अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए अब भोपाल जीतना जरुरी हो गया है। उनकी प्राथमिकता में अब प्रदेश नहीं बल्कि भोपाल की जीत है।

- अजय सिंह : विंध्य में कांग्रेस का सबसे बड़ा चेहरा अजय सिंह खुद की सीट को लेकर ही उलझन में हैं। अभी यही तय नहीं हो पाया है कि वे सतना से लड़ेंगे या सीधी से। उनका लोकसभा क्षेत्र बहुत चुनौतीपूर्ण है। विधानसभा चुनाव ने उनको चुरहट से ही हार का बड़ा झटका दे दिया है जिसको लेकर अब वे सतर्क हो गए हैं। उनके राजनीतिक भविष्य के लिए लोकसभा चुनाव में जीत अहम है ऐसे में प्रदेश पीछे छूट जाता है।

- दीपक बावरिया : प्रदेश प्रभारी दीपक बावरिया स्वास्थ्य कारणों से प्रदेश को समय नहीं दे पा रहे। विधानसभा चुनाव में उन्होंने बड़े नेताओं के कंधे से कंधा मिलाकर चुनाव प्रचार किया था,जनसभाएं ली थीं और जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करने का काम किया था। बावरिया के अलावा अरुण यादव को खंडवा से जीतना राजनीतिक रुप से बेहद जरुरी हो गया है, वहीं कांतिलाल भूरिया के लिए भी इस बार रतलाम-झाबुआ की सीट पर जीत आसान नहीं है, ऐसे में उनका फोकस अन्य आदिवासी सीटों से ज्यादा रतलाम-झाबुआ पर है।

ये रहे भाजपा के स्टार प्रचारक :

- शिवराज सिंह चौहान : पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान प्रदेश के एकमात्र ऐसे नेता हैं जिनको आज भी जननेता कहा जाता है। प्रदेश के साथ-साथ देश में भी उनकी लोकप्रियता है। केंद्रीय संगठन ने उनको प्रदेश के अलावा देश की जिम्मेदारी भी सौंप दी है। वे तीन दिन प्रदेश में प्रचार करेंगे तो दो दिन देश के अलग-अलग राज्यों में जा रहे हैं। ऐसे में प्रदेश के उम्मीदवारों को कम समय ही मिल पाएगा।

- राकेश सिंह : प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह की स्थिति जबलपुर में बेहद चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है। विधानसभा चुनावों में उनकी हालत और पतली हो गई है। राकेश सिंह को अभी खुद की सीट बचाने के लाले पड़ रहे हैं। वे अपना पूरा समय जबलपुर में जमावट करने में दे रहे हैं। विधानसभा चुनाव में हार ने उनके नेतृत्व पर पहले ही सवाल उठा दिए हैं,ऐसे में यदि लोकसभा के नतीजे अपेक्षानुरुप नहीं आए तो उनका राजनीतिक कॅरियर संकट में आ जाएगा।

- नरेंद्र सिंह तोमर : विधानसभा चुनावों में नरेंद्र सिंह तोमर ने प्रदेश में खूब प्रचार किया। चुनाव प्रबंधन की कमान संभालने की जिम्मेदारी के चलते भी वे प्रदेश में सक्रिय रहे। अब लोकसभा चुनाव में उनके लिए भी मुश्किल आन पड़ी है। ग्वालियर में खस्ता हालत के चलते उनको मुरैना से उम्मीदवार बना दिया गया है। भोपाल से उम्मीदवारी को लेकर भी उनके नाम की चर्चा है। भोपाल हो या मुरैना दोनों ही सीट पर उनके सामने कड़ी चुनौती है, ऐसे में उनका फोस अपनी सीट पर ही ज्यादा है।