
नाटक पंचतंत्र की प्रस्तुति देते रंग श्री बेले के कलाकार
भोपाल. रंगश्री लिटिल बैले ट्रुप संस्था की ओर से सोमवार को नाटक पंचतंत्र का मंचन किया गया। इसका नृत्य निर्देशन स्व. शांतिबद्र्धन ने 1953 में किया था। इसका पहला शो 1954 में हुआ था। तब से अब तक 20 देशों में इसके करीब 800 शो हो चुके हैं। उस वक्त नाटक का संगीत बहादुर हुसैन खां ने तैयार किया था तो मुखौटे अप्पिुनि कर्ता ने डिजाइन किए थे। संस्था ने इन्हें अब तक उसी रूप में सहेज कर रखा है। नाटक में अब भी इन्हीं का इस्तेमाल होता है।
पंचतंत्र की कहानी पं. विष्ण शर्मा की है। वर्तमान में खेल-खेल में बच्चों को शिक्षा देने की बात होती है, हमारे देश में हजारों वर्षों से इस तरह से शिक्षा दी जाती रही है। अंतिम बार रूस में इस नाटक के चार शो हुए थे। नाटक में चूहे, चिड़िया, कौआ, पेड़ की प्रॉपर्टी संस्था की हैरिटेज प्रॉपर्टी में शुमार है। पचास मिनट के नाटक में 16 कलाकारों ने ऑनस्टेज अभिनय किया है। नाटक में पक्षियों के जरिए से शिक्षा, दोस्ती, जाति, सद्भाव और धर्मनिरपेक्षता के पारम्परिक और संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखने का संदेश है। नाटक मे दिखाया गया कि राजा महारोप्या अपने पुत्रों को शिक्षित करने की जिम्मेदारी पं. विष्णु शर्मा को सौंपते हैं।
जाल को लेकर उड़ जाती हैं चिड़िया
पं. विष्णु शर्मा पक्षियों की कहानी के जरिए उन्हें पढ़ाते हैं। वह कहानी सुनाते हैं कि जंगल में एक शिकारी ने चिड़िया के समूह को पकडऩे जाल बिछाता है, जिसे कौआ देख लेता है और चिड़िया को बताता है। नाटक में आगे दिखाया गया कि कौआ ने जब यह सब कुछ देखा तो वह उड़कर चूहे के पास पहुंचा और उसको सारी बताकर मदद मांगी। चूहा जाल को काट पाता इससे पहले शिकार वहां पहुंच जाता है। चिड़िया एकता प्रदर्शित करते हुए जाल को लेकर ही उड़ जाती है।
इसके बाद चूहे ने जाल काट कर सभी चिड़ियों को बाहर निकाल लिया। कौआ, कबूतर, चूहा और चिड़ियों में मित्रता हो जाती है। जब जंगल में अकाल पड़ता है तो सभी मिलकर संकट का सामना करते हैं और सुरक्षित स्थान पर शरण लेते हैं। इस कहानी के माध्यम से राजकुमारों को राजनीति के लिए शिक्षा मिलती है कि मेलजोल, एकता और भाईचारे से ही राज्य और समाज के संकट दूर होते हैं तथा राष्ट्र मजबूत होता है।
Published on:
08 Feb 2022 12:54 am
बड़ी खबरें
View Allभोपाल
मध्य प्रदेश न्यूज़
ट्रेंडिंग
