
राजा भर्तृहरि की मौत की खबर सुनकर रानी कर लेती है आत्महत्या
भोपाल जनजातीय संग्रहालय में 'अभिनयन' शृंखला में जितेन्द्र टटवाल के निर्देशन में नाटक 'राजा भर्तृहरि' का मंचन हुआ। मालवी लोक नाट्य शैली (माच) में यह नाटक राजा भर्तृहरि के द्वारा अपना राज-पाठ त्याग कर संन्यास धारण करने की लोककथा है। नाटक की शुरुआत राजा भर्तृहरि से होती है। वे अपने प्रधानमंत्री से राज्य का हाल-चाल पूछते हैं।
प्रधानमंत्री बताते हैं कि राज्य में प्रजा बहुत सुखी है। बकरी और शेर एक ही घाट पर पानी पी रहे हैं। राजा के शिकार पर निकलने से पहले उनकी धर्मपत्नी रानी पिंगला चिंता व्यक्त करती है। लौटने पर राजा बहुत उदास हो जाते हैं। वह बताते हैं कि शिकार पर जाते समय पानी की झार का सारा पानी एक मरते हुए प्यास से व्याकुल गिद्ध को पिला दिया, उसने अपने प्राण त्याग दिए। उसका अंतिम संस्कार किया तो हजारों गिद्धनियां पति की चिता पर सती हो गई।
राजा जानना चाहता है सती का सच
जंगल के जीवों के सत्य को देखकर वे आश्चर्यचकित और व्याकुल हो जाते हैं। ये सुन रानी पिंगला कहती है कि ये तो कुछ भी नहीं असली सती अभी आपने देखी कहां है। तब राजा, रानी से पूछते हैं कि असली सती कैसी होती है मुझे बताओ? राजा के कई बार पूछने पर भी रानी उन्हें कुछ नहीं बताती।
मृगनियां देती हैं राजा भर्तृहरि को श्राप
तभी नाटक में एक भील का प्रवेश होता है जो राजा से मदद की गुहार लगाता है। राजा उसकी मदद करने के लिए जंगल में जाता है। राजा अपने मंत्री से रानी पिंगला से झूठ बोलने के लिए कहते हैं कि एक पागल शेर ने मुझे मार दिया है। यह खबर सुनते ही रानी किले के ऊपर कूद कर अपनी जान दे देती हैं। इधर, राजा जंगल में एक श्यामवर्ण हिरण को मार देते हैं। मृगनियां राजा को श्राप देकर सती हो जाती है।
Published on:
26 Mar 2019 07:16 am
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