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MP के इस भील आदिवासी ने उड़ा रखी थी अंग्रेजी हुकूमत की नींद

जनजातीय संग्रहालय में 'सुराज चित्रकला' शिविर में कविताओं पर पेंटिंग बना रहे कलाकारों ने साझा किए अनुभव...

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sanjana kumar

Aug 19, 2016

Tribal Museum,mp art,bhil art,bhopal,mp

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भोपाल। एक अनपढ़ आदिवासी ने अंग्रेजी हुकूमत की नींदे उड़ा रखी थी। वो आदिवासीयों का रॉबिनहुड था। अंग्रेजी हुकूमत को ध्वस्त कर देने वाली जिद और संघर्ष की मिसाल था टंट्या भील।

मध्यप्रदेश का जननायक टंट्या भील ने अपनी आखरी सांस तक फिरंगी सत्ता की ईंट से ईंट बजाकर रखी थी। ये तो बात हुई केवल एक आदिवासी महानायक की। देश की लगभग हर जनजाति में ऐसे कई महानायक हुए हैं जिन्होंने 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लिया। जिस तरह देशभक्ति गीत हमारे मन में देशप्रेम पैदा करते हैं। उसी तरह इन जनजातियों में भी देशभक्ति से ओतप्रोत कविताएं प्रचलित हैं।


इन कविताओं में अंग्रेजों के देश में आने, फूट डालो राज करो नीति, शोषण, गुलामी और आजादी की दास्तान को समेटा गया है। इन्हीं कविताओं को आधार बनाकर इन दिनों ट्राइबल म्यूजियम में एक चित्र शिविर का आयोजन किया जा रहा है। इस कैम्प में गोंड और भील जनजाति के साथ ही महाराष्ट्र, बिहार, उड़ीसा और आंध्रप्रदेश के आदिवासी कलाकार हिस्सा ले रहे हैं।

परिछत के पराक्रम ने छुड़ाए अंग्रेजों के छक्के

पेंटिंग :

mp art

कविता: 'परिछत का हाथी ऐसो, भूरी हथिनियां गरद मिल जाए..'

बुंदेलखंड का राजा परिछत, मुर्गे के बांग देते ही अंग्रेजो से लडऩे निकल पड़ता था। उनका हाथी दुश्मन सेना के हाथियों को मार गिराता था। इसी कविता को वेंकटरमन सिंह शाह गोंड आर्ट में कागज पर सजा रहे हैं। चित्रों में राजा परिछत अपने हाथी पर बैठकर हजारों की संख्या में अंग्रेज सैनिकों के सर काट रहे है। भारी संख्या में अंग्रेजों के कटे सिर पहाड़ी से लुढ़कते नजर आ रहे हैं। एक अन्य चित्र में हाथी अपनी सूंढ से अंग्रेजों को पटक-पटक कर मार रहा है। परधान कम्यूनिटी से बिलॉन्ग करने वाले वेंकट ने राजा परिछत के अंग्रेजों से युद्ध को 5 पेंटिंग्स में समेटा है।


समुद्र के रास्ते आए और सोने की चिडिय़ा को लूट ले गए

mp art

कविता: 'सब हरे-भरे खेत उजड़ गए। फिरंगियों ने सारी संपत्ति लूट ली। जल भरने न जाओ,
पनघट पर फिरंगी डोल रहा है..'

पेंटिंग

इस रचना को झाबुआ के रहने वाले भील ट्राइबल आर्टिस्ट सुभाष अमलियार कैनवास पर उकेर रहे हैं। इस चित्र में उन्होंने अंग्रेजों द्वारा देश में मचाई तबाही को दिखाया है। पेंटिंग में हरे-भरे खेत के जरिए देश को सोने की चिडिय़ा का रूप दिया है। वहीं, समुद्र के रास्ते देश में घुसते अंग्रेजों को दिखाया है। वहीं, घोड़े के जरिए देश को लूटने की दास्तां बयां की है। उन्होंने पेंटिंग करना मां गंगुबाई से सीखा।


गोलियों ने किया छलनी


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कविता: 'भैया सोवण को नहीं हई जमानो, देश आजाद, अपणो वणावुण..'

पेंटिंग

झाबुआ की लाड़ो बाई इस रचना को भील आर्ट में कैनवास पर उकेर रही हैं। इस कविता का अर्थ है सोने का समय खत्म हो चुका है, अब जागना है। जनरल डायर जैसे अत्याचारियों से इस देश को आजाद कराना है। लाड़ो बाई जलियांवाला बाग हत्याकांड कैनवास पर उतार रही हैं। उन्होंने बेहद मार्मिकता के साथ भारतीयों पर अंग्रेजो के जुल्मों की कहानी कही है। चारों ओर से बंद जलियांवाला बाग में हजारों निहत्थे स्त्री, पुरुष और बच्चों पर बेदर्दी से डायर ने गोली चलाई।

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द्वापर में मोहन और कलयुग में मोहनदास

mp art

कविता: 'द्वापर में मोहन हुआ, कलियुग में मोहनदास, एक था जनम्या जेल में, एक रहा कारवास..'

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पेंटिंग

मधुबनी बिहार के सरोज कुमार झा की पेंटिंग्स मथुरा के मोहन को देश के बापू मोहनदास करमचंद गांधी के समकक्ष रखती हैं। इसमें उन्होंने मधुबनी आर्ट के जरिए जेल में कृष्ण जन्म और कंस वध को कागज पर उतार रहे हैं। दूसरी पेंटिंग्स में कंस वध के लिए जेल में जन्म लेते कृष्ण और देश को आजाद कराने के लिए बापू की जेल यात्रा को दिखाया है।


आजादी के देवता के समान हैं बापू

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कविता: उये है अकासे में पुन्नी के चंदा, अवतरे दुनिया में हवै गांधी देवता...'

पेंटिंग

मुंबई की मानकी बापू बाएड़ा ने वरली आर्ट में कविता को आकार दे रही हैं। इस कविता का सारांश है कि लोग पूर्णिमा के चांद को देखकर जश्न मना रहे हैं। देश को आजाद कराने वाले गांधी जी देवता के रूप में पूजे जा रहे हैं। एक अन्य पेंटिंग में बापू के चरखे को हथियार के रूप में अभिव्यक्त किया गया है। जहां चरखा शक्ति का रूप हैं। वहीं, विदेशी कपड़ों की होली जलाई जा रही है।