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शिक्षकों ने पहचाने – टिटहरी, नीलकंठ और लटोरा, इनकी खासियत भी जानी

क्षेत्रीय प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय में एक दिवसीय कार्यक्रम आयोजित

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भोपाल। क्षेत्रीय प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय द्वारा शिक्षकों के लिए पक्षियों पर आधारित एक दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन शुक्रवार को किया गया। इस कार्यक्रम में मप्र के विभिन्न विद्यालयों के 31 शिक्षकों ने भाग लिया। कार्यक्रम के तहत सुबह बर्ड वॉचिंग कैम्प सारस जैवविधिता शिक्षा केन्द्र विशनखेड़ी में हुआ।

यहां प्रतिभागियों ने सारस क्रेन, बगुला, चम्मचचोंचा, ग्रे हॉर्नविल, टिटहरी, नीलकंठ, लटोरा, पनकौआ, पेंटेड स्टार्क, ओपन बिल स्टार्क आदि लगभग 25 प्रजातियों के पक्षियों की पहचान की। कार्यक्रम के तकनीकी सत्र के दौरान भोपाल बड्र्स संस्था की पक्षी विषेशज्ञ डॉ. संगीता राजगीर द्वारा संग्रहालय में पक्षियों की सम्पूर्ण जानकारियां जैसे- परिचय, उद्विकास, पहचान, भोजन, आदतें, पक्षियों का महत्व, नीडऩ एवं प्रवास आदि से प्रतिभागियों को अवगत कराया गया।

उन्होंने बताया कि कई पौंधों के बीजों का अंकुरण पक्षियों के बीट करने से होता है जो कि साधारण रूप से बोये जाने पर नहीं होती। आगे बताया गया कि लम्बी दूरी तय करने वाले पक्षी बिना आराम व भोजन किए हजारों मील का सफर तय कर लेते हैं इसके दौरान उनका एक तरफ का हिस्सा उस समय सक्रीय और दूसरा हिस्सा आराम कर लेता है। इसे यूनी लैटरल आई क्लोजिंग सिस्टम कहा जाता है।

चमत्कार के पीछे का जाना विज्ञान

जवाहर बाल भवन में शुक्रवार को केमिस्ट्री पर वर्कशॉप का आयोजन किया गया। इसमें प्रभाग की प्रभारी परबीन निशा ने बच्चों को ढोंगी बाबाओं की चमत्कार दिखा कर ठगने की कला के पीछे के छिपे विज्ञान को प्रयोगोंं के माध्यम से समझाया। जैसे बिना माचिस के आग लगना, पानी में आग लगना, फूल का रंग अपने आप बदल जाना आदि चमत्कार दिखाए। उन्होंने बताया कि पोटेशियम परमैंग्नेट पर जब एक निश्चित मात्रा में ग्लिसरीन डाली जाती है तो रासायनिक क्रिया द्वारा उसमें आग लग जाती है।

इसी प्रकार सोडियम मैटल हवा या पानी के सम्पर्क में आकर जल जाता है। इसे नारियल में छिपाकर रख दिया जाता है और जब उस पर पानी डाला जाता है तो आग उत्पन्न हो जाती है। इसी तरह फिनोप्थलीन एवं अमोनिया रंगहीन होते हैं। जब फूलों को फिनोप्थलीन से भिगोने के बाद उस पर अमोनिया डाला जाता है तो यह गुलाबी हो जाता है।