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महिला संतों की श्रृंगार की भवभूमि को हमें भारतीय आध्यात्मिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में समझना होगा

एमएलबी कॉलेज में हिंदी विभाग द्वारा दो दिवसीय राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी

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महिला संतों की श्रृंगार की भवभूमि को हमें भारतीय आध्यात्मिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में समझना होगा

भोपाल। शासकीय महारानी लक्ष्मीबाई कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय(एमएलबी कॉलेज) में 'भारतीय संत परंपरा में महिला संतों का योगदान' विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी का आयोजन किया गया। केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा इसका प्रायोजक और कॉलेज का हिन्दी विभाग इसका आयोजक है। संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता डॉ. कपिल तिवारी, अध्यक्ष के रूप में केंद्रीय हिन्दी संस्थान के नवीकरण एवं भाषा प्रसार विभाग के प्रो. रामवीर सिंह और विशिष्ठ अतिथि के रूप में साहित्यकार डॉ. मृदला पारेख मौजूद थीं। बीज वक्तव्य आलोचक डॉ. शंभु गुप्ता, वक्तव्य मुंबई के खालसा कॉलेज के एसोसिएट प्रो. डॉ. मृगेन्द्र राय, कवि शंपा शाह, कवि डॉ. प्रताप राव कदम ने दिया। इस संगोष्ठी में पहले दिन देशभर से भारतीय संत परंपरा में महिला संतों का योगदान विषय पर 50 शोध पत्र प्रस्तुति किए गए।

इस अवसर पर डॉ. कपिल तिवारी ने कहा कि भक्तिकाल की महिला संतों के यहां श्रृंगार की भवभूमि को हमें भारतीय आध्यात्मिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में समझना होगा। भारतीय परंपरा में हमने समष्टि को दो रूपों में देखा है, एक सत्य के रूप में, दूसरा प्रेम के रूप में। मीरा की पूरी संबोधी गिरधर गोपाल के लिए है। उन्होंने कश्मीर की महिला संत लल्लेश्वरी, सहजोबाई, दयाबाई आदि महिला संतों के आध्यात्मिक तथा रचनात्मक अवदानों को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि विचार हमेशा उन्हीं विषय पर होते हैं, जिन विषय पर विचार हो चुके हैं, इसलिए मैं चाहता था कि कुछ ऐसे विषयों को लिया जाए, जिस पर बहुत कम विचार हुआ हो या चर्चा।

लोयण के सारे गीत लाखा पर आधारित

साहित्यकार डॉ. मृदुला पारेख ने गुजरात की महिला संत परंपरा पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने महिला संत लोयण के बारे में बताते हुए कहा कि लोयण बहुत खूबसूरत है, जिस पर राजा लाखा की नजर पड़ जाती है और लोयण की दो बार सगाई भी होती है, लेकिन राजा लाखा के डर से बारात नहीं आती और सगाई भी टूट जाती है। इसके बाद लोयण को अकेला पाकर लाखा उसे छूने की कोशिश करता है, लेकिन जब वो पास आता है तो उसे कंकाल नजर आता है लोयण नहीं...। इसके बाद ही लोयण संत जीवन को अपना लेती है। लोयण के सारे गीत लाखा पर आधारित है, जिसमें उसे इस पूरी कहानी को बयां भी किया है। प्रो. रामवीर सिंह ने कहा कि समाज से सीना ठोककर बात करने की शक्ति संतो के पास थी। इस परंपरा की यह विशेषता है कि यहां संतो के भीतर समाज बोलता है। संतों में इतनी ताकत होती है कि वह ईश्वर को भी अपना गुलाम बना सकता है।

महाराष्ट्र की महिला संतों पर किया शोध
मैं महाराष्ट्र की संत महिलाओं पर शोध कर रही हूं। जिसमें मुगलकालीन शासन के दौरान की महिला संत का भी जिक्र किया गया। मैंने प्रेरिका संत मुक्ताबाई पर शोध किया है। संत मुक्ताबाई ने अपने सरल-वोधगम्य अभंगों के द्वारा ज्ञान, अध्यात्म, श्रेष्ठ जीवन मुक्ति, वैराग्य की बातें कही है। वे जाति-वर्ग आदि भेदों से ऊपर उठकर सम्पूर्ण समाज को अपना माना, तीनों भाईयों द्वारा एक साथ समाधि लेने से दु:खी मुक्ताबाई ने भी उसी वर्ष ऐदलाबाद में समाधि ले ली।

रेखा भालेराव, शोधार्थी
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मीरा बाई ने एकाग्रता का दिया संदेश
मैंने मीरा बाई और जना बाई पर शोध किया है। अपने शोध में मैंने मीरा बाई के बारे में बताते हुए लिखा है कि राजसी सुख-सुविधाओं का त्याग, पर्दा प्रथा जैसी कुरीतियों को छोड़कर अदभ्य साहस का मीरा बाई ने परिचय दिया है। भक्तिकाल में मीरा बाई ने जिस विरोध की मशाल को प्रज्जवलित किया, वह उस समय की परिस्थितियों में महिला की निडरता एवं आत्म-विश्वास की पुष्टि करता है, क्योंकि सती प्रथा को न अपनाकर भक्त बन जाना, उस समय समाज में स्त्री के लिए निषेध मार्ग था।

रीता माहेश्वरी, शोधार्थी