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द ग्रेट वॉल ऑफ इंडिया: ये है भारत की सबसे लंबी दीवार! जानें अपने अस्तित्व के संकट से जूझती इस दीवार की खासियत

- एक हजार साल पूरानी है दीवार... - भोपाल से केवल 200 किमी की दूरी पर मौजूद है The Great wall of india

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द ग्रेट वॉल ऑफ इंडिया: ये है भारत की सबसे लंबी दीवार! जानें अपने अस्तित्व के संकट से जूझती इस दीवार की खासियत

द ग्रेट वॉल ऑफ इंडिया: ये है भारत की सबसे लंबी दीवार! जानें अपने अस्तित्व के संकट से जूझती इस दीवार की खासियत

रायसेन। दुनिया में चीन की सबसे लंबी दीवार जैसी ही एक खास दीवार करीब एक हजार साल पहले से भारत में भी मौजूद है। इसकी लंबाई 80 किलोमीटर है,लेकिन संरक्षण के अभाव में अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जूझ रही है।

दरअसल मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के देवरी के पास गोरखपुर के जंगल से बाड़ी के चौकीगढ़ किले तक 15 फीट ऊंची और 10 फीट चौड़ी है।

बताया जाता है कि जिस तरह दुनिया की सबसे बड़ी दीवार कही जाने वाली चीन की दीवार का दूसरी शताब्दी में चीन के पहले सम्राट किन शी हुआंग ने निर्माण विदेशी हमलों से मिंग वंश को बचाने के लिए किया था।

उसी प्रकार भारत में भी 10-11वीं शताब्दी में कल्चुरी शासकों के हमले से बचने के लिए परमार वंश के राजाओं द्वारा इंटरलॉकिंग सिस्टम से एक दीवार बनवाई गई थी।

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इसे ही अब भारत की सबसे लंबी दीवार यानि great wall of india माना जाता है।

केंद्र व राज्य सरकार के कई प्रतिनिधि मंडल इसे देख भी चुके हैं, लेकिन अब तक संरक्षण पर कोई पहल नहीं हुई। जिसके कारण ये दीवार लगातार अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जूझ रही है।

उदयपुरा के पास देवरी से लगे गोरखपुर गांव के जंगल से शुरू होकर यह दीवार बाड़ी बरेली क्षेत्र में आने वाले चौकीगढ़ किले तक जाती है। भोपाल से गोरखपुर गांव की दूरी करीब 200 किमी है।

द ग्रेट वॉल ऑफ इंडिया ( great wall of india )...
जिले में देवरी के पास स्थित ग्राम गोरखपुर में लगभग 80 किलोमीटर की लंबी एक परमारकालीन दीवार है, जिसे अब तक की भारत में सबसे बड़ी दीवार को द ग्रेट वाल ऑफ इंडिया का नाम भी दिया गया है।

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यह दीवार रायसेन जिले के उदयपुरा के गोरखपुर गांव से सटे जंगल से शुरू होती है दीवार परिसर के आसपास कई जमींदोज मंदिरों के अवषेश भी मिले हैं। यहां एक बेहद प्राचीन भैरव की प्रतिमा भी मिली है, जो प्राचीन होने के साथ ही साथ दुर्लभ भी है।

10-11वीं शताब्दी में कल्चुरी शासकों के हमले से बचने के लिए परमार वंश के राजाओं द्वारा इंटरलॉकिंग सिस्टम से बनवाई गई यह दीवार भारत की सबसे लंबी दीवार मानी गई है।

केंद्र और राज्य सरकार के कई प्रतिनिधि मंडल यूं तो इसे देखने को आए और इसके महत्व को लेकर बड़ी-बड़ी बातें बीते सालों में कर चुके हैं, लेकिन इसके संरक्षण और पर्यटन विस्तार को लेकर कोई ठोस पहल नहीं हुई।

नतीजतन, अब यह दीवार दिनों दिन जीर्ण-शीर्ण होती जा रही है। इस क्षेत्र में बिखरी पड़ी प्राचीन प्रतिमाओं को भी नहीं सहेजा जा सका है।

उदयपुरा के पास देवरी कस्बे से लगे गोरखपुर गांव से सटे जंगल से शुरू होकर यह दीवार बाड़ी बरेली क्षेत्र में आने वाले चौकीगढ़ किले तक जाती है। भोपाल से गोरखपुर गांव की दूरी करीब 200 किमी है।

बेहद खास है इतिहास...
इस दीवार के संबंध में बताया जाता है कि 10-11वीं शताब्दी के मध्य परमार कालीन राजाओं ने विंध्याचल पर्वत श्रृंखला की पहाडि़यों पर स्थित सघन जंगलों में इसे बनवाया था।

यह दीवार परमार कालीन राज्य की सुरक्षा दीवार रही होगी। गौरतलब है कि गोरखपुर गांव से आगे ही नरसिंहपुर और जबलपुर पड़ता है, जो उस दौर में यह कल्चुरी शासन के तहत ही आता था। उस समय परमार और कल्चुरी शासकों के मध्य कई युद्ध भी हुए।

इन पत्थरों की चट्टानों का किया इस्तेमाल
इस दीवार के लिए लाल बलुआ पत्थर की बड़ी चट्टानों का इस्तेमाल किया गया है। इसके दोनों ओर विशाल चौकोर पत्थर लगाए गए हैं।

हर पत्थर में त्रिकोण आकार के गहरे खांचे भी बने हुए हैं, ताकि पत्थरों की इंटरलॉकिंग की जा सके। वहीं इसको जोड़ने के लिए चूना, गारा का इस्तेमाल नहीं किया गया है।

वहीं गोरखपुर से आठ किमी दूर मोघा डैम पर इस दीवार का काफी हिस्सा आज भी सुरक्षित है।

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ये हैं सबसे खास और चौंकाने वाली बातें...

- इंटरलॉकिंग पद्धति से जुड़े हैं दीवार के पत्थर।

- 15 फीट ऊंची 10 फीट चौड़ी दीवार को 80 किलोमीटर तक नापा जा चुका है। वहीं इसे कुछ लोग 80 किमी से भी ज्यादा लंबी बताते हैं।

- कल्चुरी शासकों के हमले से बचने परमार वंश के राजाओं ने कराया था निर्माण।

- संरक्षण के अभाव में जमींदोज होती जा रही है यह दीवार।


कुंभलगढ़ किले की दीवार से दोगुनी लंबी
राजस्थान के मेवाड़ के कुंभलगढ़ किले के परकोटे की दीवार 36 किलोमीटर लंबी है, जो भारत की लंबी दीवार मानी जाती है, लेकिन रायसेन में मौजूद दीवार इससे दोगुनी से भी अधिक (80 किमी) है। बावजूद इसके, यह तथ्य कम ही लोगों की जानकारी में है।

जगह जगह बिखरीं हैं बेशकीमती मूर्तियां
क्षेत्र के ग्रामीण लोगों का कहना है कि पूरे क्षेत्र में प्राचीन बेशकीमती मूर्तियों के अवशेष इधर-उधर बिखरे पड़े हैं। दीवार के आसपास भगवान शिव, विष्णु, भैरव और सूर्य के मंदिर भी मिले हैं।

10-11वीं सदी की कई बावड़ी, तालाब, मंदिर, तहखाने भी यहां हैं, जिनमें अधिकतर जमींदोज हो चुके हैं। वहीं दीवार के सहारे बने कुछ परकोटे भी हैं।