
mp sthapna diwas
भोपाल। देश में पिछले काफी समय से रेलवे स्टेशन, सड़क और शहर के नाम बदलने का सिलसिला तेजी से बढ़ रहा है। मुगलसराय जंक्शन का नाम बदलकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन किया गया। इलाहाबाद प्रयागराज हो गया और शिमला को श्यामला करने की कोशिश जारी है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि राजधानी भोपाल में कुछ इलाकों के ऐसे नाम हैं जिसे खुद भोपाल के लोगों ने मालूमात की कमी के चलते बदल दिया। या यूं कहें कि जो जुबां को अ'छा लगा हम उसी नाम से पुकराने लगे। आज मप्र स्थापना दिवस के मौके पर शहर के नामी साहित्यकार श्याम मुंशी के हवाले से पत्रिका प्लस आपको कुछ ऐसे ही बदले नामों से रूबरू करा रहा है।
क्या आप जानते हैं इन एरियाज के असली नाम
श्यामला हिल्स : असल में इसका नाम शमला था जिसका अर्थ होता है चोटी या सिरा। भोपाल में सबसे ऊंची पहाड़ी होने के कारण इसका नाम शमला था लेकिन अज्ञानता के चलते इसके शुद्धिकरण के चक्कर में इसे शमला से श्यामला कर दिया गया।
पिपरिया पेंदे खां : इसका सही नाम पिपरिया पाएन्दा खां था। दरअसल, यहां पाएन्दा खां नाम के बहुत ही मशहूर व्यक्ति रहते थे, लेकिन वक्त बदलने के साथ लोगों को यह नाम पुकारने में जटिल लगता था। इसके चलते पाएन्दा खां की जगह पेंदे खां कहना शुरू कर दिया।
घोड़ा नक्कास : असल में इसका नाम घोड़ा नख्खास है। फारसी में नख्खास का मतलब बाजार होता है, एक वक्त में यहां घोड़ों का बाजार लगता था जिसके चलते इसका नाम घोड़ा नख्खास था। मालूमात की कमी के चलते लोग इसे घोड़ा नक्कास या घोड़ा नक्काश कहने लगे।
चार इमली : राजधानी का पॉश एरिया में शुमार इस जगह का असल नाम चोर वाली इमली और चोर इमली था। दरअसल, पुराने समय में यह घने जंगल का एरिया था। जहां चोर-डकैत अपने हिस्से का बंटवारा करते थे। एक बार जब चोर यहां मौजूद इमली के दरख्त के नीचे बैठकर हिस्सा बांट रहे थे तो पुलिस ने उन्हें घेरकर पकड़ लिया। इसके बाद लोग इस जगह को चोर वाली इमली नाम से बुलाने लगे। बाद में यह चोर इमली और अब इसका नाम चार इमली हो गया।
अट्टा सूजे खां : मंगलवारा, इतवारा और जुमेराती के बीच में मौजूद इस एरिया का असल नाम अट्टा शुजा खां था। दरअसल, यहां शुजा खां नाम के मशहूर व्यक्ति रहा करते थे। लेकिन लोगों के सही नाम उ'चारण ना कर पाने की वजह से वक्त के साथ-साथ यह शुजा खां की जगह सूजे खां हो गया।
कोहे फिजा : इस एरिया को पहले अहमदाबाद के नाम से जाना जाता था। बाद में यह कोह-ए- फिजा हो गया। असल में कोह का मतलब होता है पहाड़ और फिजा का मतलब होता है बहार। लेकिन कुछ लोग इस एरिया को कोह-ए- फिजा की जगह अब कोहे फिजा नाम से पुकारते हैं।
200 बरसों से है भोपाल से ताल्लुक
मुंशी परिवार का भोपाल से ताल्लुक करीब 200 बरसों से है। उनके परदादा मुंशी कुन्नू लाल, नवाब शाहजहां बेगम के जमाने में मीर मुंशी तामीरात (डिपार्टमेंट ऑफ कंस्ट्रक्शन के हेड) हुआ करते थे। दादाजी मुंशी मोहन लाल भोपाल स्टेट में सेंट्रल स्टोर के सुप्रिटेंडेंट थे। वहीं ताऊजी मुंशी बिहारी लाल नवाब जूनागढ़ के सेक्रेटरी रहे थे। पिता जी सेंट्रल गर्वनमेंट पोस्ट एंड टेलीग्राफ में हेड रिकॉर्ड ऑफिसर थे। श्याम मुंशी बताते हैं मैंने विलीनकरण का तमाशबीन था। मैंने भोपाल के बारे में जो बुजुर्गों ने सुना और पढ़ा साथ ही व्यक्गित अनुभव से जाना उसके आधार पर एक किताब 'सिर्फ नक्शे कदम रह गए' लिखी। 200 पेजेस की यह किताब वर्ष 2017 में प्रकाशित हुई है।
Published on:
01 Nov 2018 03:07 pm
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