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मनुष्य में संतुष्टि का भाव जगाता है चराचरवाद

पावस व्याख्यानमाला में दूसरे दिन तीन सत्रों में हुआ विमर्श

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मनुष्य में संतुष्टि का भाव जगाता है चराचरवाद

भोपाल। मप्र राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के तहत हिन्दी भवन में चल रही पावस व्याख्यान माला के दूसरे दिन तीन सत्रों में व्याख्यान हुए। इनमें पहले सत्र में मानववाद और चराचरवाद, दूसरे सत्र में हिन्दी तथा भारतीय भाषाओं के अंतर्सबंध और तीसरे सत्र में राष्ट्रभाषा हिन्दी- बाधाएं और चुनौतियां विषय पर विचार-विनिमय हुआ।

सुबह के सत्र में प्रो. रमेशचन्द्र शाह की अध्यक्षता में मानववाद और चराचरवाद विषय पर सुप्रसिद्ध विचारक के.एन गोविंदाचार्य ने मुख्य वक्तव्य दिया। गोविंदाचार्य ने कहा कि वाद शब्द सीमा में बांधता है। यह सीमा कठमुल्लापन तक ले जाती है। मानववाद से व्यक्ति संतुष्ट नहीं हो पाता है।

रावण ने उन्मुक्त उपभोग किया लेकिन अतृप्त ही रहा। चराचरवाद प्रकृति केन्द्रित है इसलिए यह संतुष्टि का भाव जगाता है। पश्चिम की धारणा है कि विकसित होना है तो अपनी जड़ों से कटना होगा। हम भारतीयों ने इसे बखूबी अपनाया है और इसी वजह से हम इस कदर समस्याओं में घिर गए हैं। वक्तव्य की शुरुआत में उन्होंने पावस व्याख्यानमाला द्वारा शुरु की गई संवाद की परंपरा की सराहना की।

सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रो. रमेशचन्द्र शाह ने भी अपने इस बात से सहमति जताते हुए कहा कि वाद शब्द बंधनकारी है। उनका कहना था कि कई विचारकों ने माना है कि मानववाद ही पर्याप्त नहीं है। मानव सभ्यता को संकट से उबारने के लिए चराचरवाद की तरफ ही जाना होगा।

विषय प्रवर्तन करते हुए प्रो. अंबिकादत्त शर्मा ने कहा कि इस विषय के जरिए हम पूरब और पश्चिम को आमने-सामने बैठा सकते हैं और पश्चिमी सभ्यता के विकास की भूलों से परिचित करा सकते हैं। इस सत्र का संचालन संतोष श्रीवास्तव ने किया। दूसरे सत्र में हिन्दी तथा भारतीय भाषाओं के अंतर्संबंध विषय पर व्याख्यान हुए। डॉ. सदानंद गुप्त की अध्यक्षता में हुए इस सत्र में हिन्दी और मराठी भाषा के संबंधों पर दामोदर खड़से ने कहा कि हिन्दी और मराठी में लिपि तथा बहुत हद तक व्याकरण दोनों ही दृष्टि से समानता है।

कई हिन्दी कवियों ने मराठी में और मराठी कवियों ने हिन्दी में लिखा है। अनुवाद और पत्रकारिता ने दोनों भाषाओं के संबंधों को पुष्ट किया है। गुजराती और हिन्दी के आपसी संबंधों पर चर्चा करते हुए डॉ. मीनाक्षी जोशी ने कहा कि मराठी की तरह ही गुजराती भी हिन्दी के बहुत करीब है।

उन्होंने हिन्दी को सभी भाषाओं की रीढ़ निरुपित करते हुए दूसरी भारतीय भाषाओं को रक्त कोशिका बताते हुए हिन्दी को रक्त बताया। सत्र में हिन्दी और तेलुगु पर प्रो. शेषारत्नम और हिन्दी और कन्नड़ पर प्रो. ललिताम्बा ने अपने विचार रखते हुए कहा कि ये भारतीय भाषाएं हिन्दी से बहुत गहरे तक जुड़ी हुईं हैं। इनके साहित्य में भी प्रचुर मात्रा में आवाजाही है। सत्र का संचालन शीला मिश्र ने किया।


व्याख्यानमाला का तीसरा सत्र साहित्य अकादमी के निदेशक प्रो. उमेश कुमार सिंह की अध्यक्षता में राष्ट्रभाषा हिन्दी - बाधाएं और चुनौतियांÓविषय पर वक्तव्य हुए। सत्र में हिन्दी की व्याप्ति पर बोलते हुए आनंद प्रकाशा त्रिपाठी ने कहा कि बाजार के इस युग में हिन्दी विश्व की जरुरत बन गई है। आज हिन्दी कई देशों में पढ़ाई जा रही है।

मुम्बई से आए हिन्दी के शोधकर्ता जवाहर कर्नावट ने सूचना प्रोद्योगिकी में हिन्दी संचालन विषय पर विचार रखते हुए कहा कि हिन्दी से युवा पीढ़ी को जोडऩा होगा और यह तभी हो सकेगा जब तकनीकी क्षेत्र में हिन्दी का प्रयोग बढ़ेगा। डॉ. अमरनाथ ने बोलियों का आठवीं सूची के लिए आग्रह विषय पर कहा कि बोलियों को आठवीं सूची में शामिल कराए जाने की होड़ एक तरह से हिन्दी को कमजोर करने का प्रयास है।

प्रो. आशा शुक्ला ने विश्व हिन्दी सम्मेलनों की सार्थकता पर विचार रखते हुए कहा कि यहां लिए गए निर्णयों के क्रियान्वयन की दिशा में पहल होनी चाहिए। सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रो. उमेश कुमार सिंह ने कहा कि हिन्दी की मजबूती के लिए बोलियों का संरक्षण जरूरी है। उन्होंने अंग्रेजी का विरोध अपने घर से किए जाने की बात पर जोर दिया। सत्र का संचालन राजकुमारी शर्मा ने किया।