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शब्द का सामने से कुछ और ही अर्थ नजर आता है

रविवार को स्वराज भवन में रजा व्याख्यान का आयोजन किया गया।

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शब्द का सामने से कुछ और ही अर्थ नजर आता है

भोपाल। मीर तकी 'मीर की शायरी का लोहा, एक जमाने से उर्दू के वे शायर भी मानते आ रहे हैं। कितने ही लब्धप्रतिष्ठित कवियों ने मीर की असाधारण रचनाधर्मिता की प्रशंसा की है।

इसी मीर की कविता को समझने-समझाने का काम किया प्रतिष्ठित समालोचक शम्सुर्रहमान फारूकी ने शेर-ए-शोरअंगेज नामक अपनी उर्दू पुस्तक के माध्यम से, जो चार खण्डों में प्रकाशित हुई थी।

देश के जाने-माने उर्दू उपन्यासकार व आलोचक शम्सुर्रहमान फारूकी स्वराज भवन में रविवार को रजा व्याख्यान में मीर पर अपना वक्तव्य देने के लिए मौजूद थे।

फारूकी ने पाश्चात्य काव्य-चिन्तन की मिलीजुली दृष्टि से मीर की शायरी को समझने का प्रयास ही नहीं किया अपितु उसकी आत्मा में उतरकर सृजन के उन बिन्दुओं को पकडऩे का प्रयत्न भी किया है।

फारूकी ने कहा कि जरूरी नहीं होता कि शब्द का सामने से नजर आ रहा वही एक अर्थ ही उसका अर्थ हो। किसी अच्छे या बड़े शेर के शब्दों में अर्थ तह-दर-तह निहित होते हैं।

उन निहित अर्थों तक पहुंचने के लिए पाठक को रचनाकार के युग, युगीन परिस्थितियों, विसंगतियों, संवेदनाओं तथा मूल्यों के प्रति भी सजग होना होता है, तब जाकर ही पाठक न केवल शेर का मुकम्मल लुत्फ उठा पाता है बल्कि इससे उसकी अपनी समझ को भी विस्तार प्राप्त होता है।

कागज़़ों में हमारे सबसे बड़े शायर माने जाने वाले मीर के बारे में लोग राय ज़ाहिर करते हैं कि अब तक उन्होंने जो कहा है उसमें से ढाई-तीन फ़ीसदी, चार फ़ीसदी ही अच्छा कहा गया है बाक़ी सब घास है। सारा मामला ये है कि हम लोगों ने वो कल्चर अपने हाथों से गंवा दिया। लोग बिल्कुल भूल गए कि उस ज़माने में प्रेम करना कैसे होता था,

कलाकार की वैल्यू क्या थी, उठने-बैठने के तरीक़े क्या थे, शायरी से क्या अपेक्षा करते थे, दुनिया को किस नज़रिए से देखते थे। मीर को लोगों ने रोने-धोने वाला, गम में डूबा रहने वाला, बदमिजाज तक कहा।

विडंबना यह है कि उन्हें पढ़े बिना ही यह राय बना ली गई। इस मौके पर उनकी बेटी बारां फारुकी, उदयन वाजपेयी, ध्रुव शुक्ल, संगीता गुंचेजा, अखिलेश सहित अन्य सुधिजन उपस्थित रहे। 30 जुलाई को श्री फारुकी गालिब पर अपना वक्तव्य देंगे।