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कला जगत के लिए खुशखबरी: भारत भवन में शुरू होगा रंगमंडल, आकार लेगा कलाग्राम

मुक्ताकाश मंच पर नजर आई ओंकार पर्वत स्थित करीब 300 साल पुराने गणेश मंदिर की झलक

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भोपाल। भारत भवन के 40वें वर्षगांठ दिवस समारोह में संस्कृति विभाग के राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय सम्मान दिए गए। इस मौके पर संस्कृति मंत्री उषा ठाकुर ने कहा कि भारत भवन में कलाग्राम की स्थापना की जाएगी। इसके लिए एक एकड 5 डेसिमिल जमीन भी भारत भवन को आवंटित हो चुकी है। कला ग्राम प्रदेश की परंपरागत चित्रांकन के संचयन एवं प्रदर्शन, महाभारत-रामायण पर आधारित लोक शैलियों पर केंद्रित अध्ययन, प्रदेश की संस्कृति के विभिन्न पक्षों पर परिसंवाद, व्याख्यान, फिल्म प्रदर्शन और डॉक्यूमेंटेशन का केंद्र बनेगा। उन्होंने कहा कि भारत भवन की धरोहर रंगमण्डल को पुन: प्रारंभ किया जाएगा। इस मौके पर पद्मश्री दुर्गा बाई व्याम के चित्रों, रेखांकन कला प्रदर्शनी-सुरेखा और प्रतिष्ठित कलाकारों की कृतियों की प्रदर्शनी भी लगाई गई।

कालिदास और शिखर सम्मान दिए गए
इस मौके पर रूपंकर कलाएं के लिए राष्ट्रीय कालिदास सम्मान ज्योति भट्ट, इरा चौधरी, परमजीत सिंह और ध्रुव मिस्त्री को दिया गया। रंगकर्म के लिए राष्ट्रीय कालिदास सम्मान लखनऊ के डॉ. अनिल रस्तोगी और वामन केंद्रे को दिया गया। राज्य शिखर सम्मान हिंदी साहित्य के लिए शैवाल सत्यार्थी और हरी जोशी को दिया गया। उर्दू साहित्य के लिए नईम कौसर और देवीशरण को सम्मान मिला। वहीं, रूपंकर कलाएं के लिए देवीलाल पाटीदार और मनीष पुष्कले को, नाटक के लिए वैशाली गुप्ता और केजी त्रिवेदी को, जनजातीय एवं लोक कलाएं के लिए अग्नेश केरकट्टा और पूर्णिमा चतुर्वेदी को, दुर्लभ वाद्य वादन के लिए बाबूलाल भोला और डॉ. वर्षा अग्रवाल को सम्मानित किए गया।
घर से निकलने की नहीं थी अनुमति
अग्नेश केरकट्टा ने बताया कि मैं उराव जनजाति से हूं। मुझे लोकगायन और पेंटिंग के लिए शिखर सम्मान मिला है। पहले मैं लोक नृत्य करती थी। साथ ही घर में ही पेंटिंग बनाती थी। लोक कला परिषद में पेंटिंग एग्जीबिट हुई। यहीं से मेरे जीवन की नई शुरुआत हुई। पहले पति ये करने से मना करते थे, घर से बाहर नहीं निकलने देते थे। मेरे काम को सराहना मिलने लगी तो पति ने भी साथ देना शुरू कर दिया।

मंच को किया प्रणाम
बाबूलाल भोला ने बांसुरी वादन करते हुए पुरस्कार ग्रहण किया। उनके जीवन पर बायोपिक भी बन रही है। उन्होंने बताया कि मेरे पिता बिहारीलाल दो बासुंरियों पर एक साथ सुर साधते थे। मैं जब 7 साल का था, तो उनकी मृत्यू हो गई। मैंने 12 वर्ष की उम्र से रियाज शुरू किया। मैंने पपीते के डंडी को सूखाकर उसमें सुराख कर विभिन्न धुनें निकालीं। इससे बुंदेलखंड के हर लोकनृत्य में इससे सुर-ताल एक साथ साध सकते हैं। 80 साल की उम्र में भी लगातार एक घंटे वादन कर लेता हूं।