
भोपाल। गांधी भवन में रंग विदूषक और रंग माध्यम नाट्य संस्था की ओर से नाट्य कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। इसमें साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता रंगकर्मी डॉ. अंजना पुरी ने कलाकारों को संगीत की बारीकियों से रू-ब-रू कराया। उन्होंने बताया कि यदि गायन, वादन और नृत्य के मिलने से संगीत बनता है, तो नाट्य उसका प्रमाण है। नियमित जीवन में आवाज के उतार-चड़ाव के साथ शारीरिक गतिविधियों के समन्वय के असंख्य उदाहरण हैं।यदि इस समन्वय को प्रदर्शन कलाओं के दृष्टिकोण से देखा जाए, तो यह महसूस होता है कि इसके अभाव में प्रदर्शन असंभव हो जाता है।उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक विविधता इसके भूगोल की तरह ही रंगीन है। इसी कारण संगीत का कैनवास बहुत बड़ा है। यहां तक की अगर कोई बैठकर पाठ का भाव लेता है, तो धड़ और ऊपरी अंग हिलते हैं। अगर आवाज और शरीर में गति के इस कुदरती, सहज और सरल समन्वय को प्रदर्शन के सिद्धांत के रूप में माना जाए, तो यह समीक्षा का विषय बन जाता है। बिना हाथ या सिर हिलाए गाना मुश्किल है। इसी तरह जहां कोई खड़ा होता है, वहां से बिना हिले-डुले नाचना असंभव है।हर कला-रूप में सीखने और सिखाने की प्रणाली हाेती है
कि हर कला-रूप में सीखने और सिखाने की एक प्रणाली होती है
उन्होंने बताया कि हर कला-रूप में सीखने और सिखाने की एक प्रणाली होती है। इसमें इसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ले जाने की विधि है। वर्तमान रंगमंच परिदृश्य में जहां अभिनेता को अभिनय की कला सिखाने के कई तरीके हैं, वहीं कुछ ऐसे हैं जो उसे स्वर को समझने, उसे स्वयं में खोजने और उसे मजबूत करने के लिए सिखाते हैं। इसका कारण यह है कि रंगमंच में संगीत को कभी भी एक स्वतंत्र विषय के रूप में नहीं माना और स्वीकार किया गया है। रंगमंच में संगीत केवल गीत बनने तक ही सीमित न हो। संगीत सिखाने के लिए एक पद्धति हो, जिसका एक हिस्सा गीत हो सकता है। अभिनेता को इसे अच्छी तरह से प्रस्तुत करने में सक्षम होने के लिए, एक कार्य-प्रक्रिया की आवश्यकता होती है।
Published on:
23 Apr 2023 07:25 pm
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