
autism treatment
भोपाल। जीवन में हर मां-बाप चाहते हैं कि उनका बच्चा तंदुरुस्त हो लेकिन कुछ बच्चे जन्म से ही किसी न किसी बीमारी का शिकार हो जाते हैं जैसे कि ऑटिज्म। ऑटिज्म एक ऐसी बीमारी है जिसके लक्षण बचपन में ही दिखाई देने लगते है लेकिन कुछ पेरेट्स इन्हें अनदेखा कर देते है जिसके कारण उन्हें बाद में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। आपने देखा होगा कई बच्चे खुद में मस्त रहते हैं और किसी से ज्यादा बात नहीं करते। इसके अलावा वे दूसरे बच्चों की तुलना में कम बोलते हैं। इस तरह के बच्चे ऑटिज्म के शिकार होते है। लड़कियों के मुकाबले लड़कों को ऑटिज्म होने की संभावना चार गुना ज्यादा होती है। इस बीमारी का पूरा इलाज तो संभव नहीं है, लेकिन विभिन्न थैरेपी के जरिए बच्चा सामान्य जिंदगी जी सकता है। पत्रिका प्लस के माध्यम से ऐसे बच्चों के पैरेंट्स को अवेयर किया जा रहा है जो लक्षणों पर गौर नहीं करते। जिसके कारण बच्चे डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं।
मेल बेबी होते हैं ज्यादा शिकार
वैसे तो कोई भी ऑटिज्म का शिकार हो सकता है, लेकिन फीमेल बेबी की अपेक्षा मेल बेबी ऑटिज्म का ज्यादा शिकार होते हैं। जैनेटिक कारणों से ऐसा होता है। पेरेन्ट्स अब ऑटिज्म को लेकर अवेयर हो रहे हैं। इस कारण इस तरह के केस सामने आने लगे हैं। इस तरह के बच्चों को स्पेशल ट्रेनिंग की जरूरत होती है। फिजियोथैरेपी और स्पीच थैरेपी के माध्यम से उन्हें नॉर्मल लाइफ जीने में मदद की जा सकती है।डिप्रेशन का हो जाते हैं शिकारतीन साल तक बच्चों का इलाज शुरू नहीं होता तो बच्चे खोए-खोए रहने लगते हैं। लंबे समय तक इलाज नहीं हो तो वे डिप्रेशन में चले जाते हैं। खुद को नुकसान पहुंचाने की भी आशंका रहती है। एंटीसाइकोटिक मेडिसिन की मदद से उन्हें नॉर्मल रहने में हेल्प की जा सकती है।
क्या हैं ऑटिज्म
हर बच्चे में इसके लक्षण अलग-अलग होते हैं इसलिए इसे ऑटिस्टिक स्पैक्ट्रम डिसऑर्डर कहा जाता है। ऑटिज्म जन्म से लेकर 3 साल की उम्र तक विकसित होने वाला ऐसा रोग है जिससे बच्चे का मानसिक विकास रूक जाता है। इससे पीड़ित कुछ बच्चे बहुत जीनियस होते है लेकिन उन्हें बोलने और सामाजिक व्यवहार में दिक्कत होती हैं। वहीं, कुछ बच्चे ऐसे होते हैं जो एक ही व्यवहार को बार-बार दोहराते हैं। सामान्य बच्चे की तुलना में इससे पीड़ित बच्चे का विकास धीरे होता है। इस बीमारी का शिकार बच्चे किसी के साथ खुलकर बात नहीं करते। किसी बात का जवाब देने में भी वे काफी समय लगाते हैं।
ऑटिज्म के कारण
वैसे तो ऑटिज्म का मुख्य कारण के बारे में अभी तक पता नहीं चल पाया लेकिन पर्यावरण या फिर जेनेटिक प्रभाव इसका कारण हो सकता है। शोध के मुताबिक बच्चे के सेंट्रल नर्वस सिस्टम को नुकसान पहुंचाने वाली कोई भी चीज ऑटिज्म का कारण बन सकती है। इसके अलावा समय से पहले डिलीवरी होना, प्रैग्नेंसी में थायरॉइड हॉरमोन की कमी, प्रैग्नेंसी में पौष्टिक डाइट न लेना और डिलीवरी के दौरान बच्चे को पूरी तरह से ऑक्सीजन न मिलना ऑटिज्म के कारण हो सकते है।
बीमारी नहीं अवस्था है ये
वैसे तो ऑटिज्म को लेकर कई प्रकार की भ्रांतियां हैं जिसमें प्रमुख है कि इसे मानसिक मंदता या मेंटली रिटार्डेड की श्रेणी में गिना जाता है जबकी ये बीमारी नहीं सिर्फ एक अवस्था। हालांकि ये बात सही है कि ये ठीक नहीं हो सकता और यही वजह है कि ऑटिज्म पीडि़त को लोग आज भी अपनाने से कतराते हैं।
इन लक्षणों को पहचानना जरूरी
- शिशु दो से तीन माह का होने के बाद भी मां को न पहचाने। उनकी बात पर रिस्पांड न करे।
- छह माह का होने के बाद भी बैठने में परेशानी हो।
- एक साल का होने पर जवाब देने, चलने में और बाय-बाय करने में परेशानी हो।
- तीन माह का होने के बाद भी अपने आप में खोया रहे। एक साल का होने पर पेरेन्ट्स के बात करने पर उनकी तरफ देखने की बजाए हवा में इधर-उधर देखता रहे।
- बच्चे को छोटी-छोटी बात पर गुस्सा आ जाता हो।
- तीन साल का होने के बाद पर किसी काम को समझाने के बाद भी एक ही काम बार-बार करे या किसी काम को सही से करने में परेशानी हो।
- बोलने में परेशानी हो। एक ही शब्द को बार-बार दोहराए। शब्द को सही तरीके से न बोल पाए।
- इलाज नहीं होने पर मानसिक विकास रूक जाता है।
- अपनी ही दुनिया में खोया रहे।
Published on:
04 Apr 2018 06:59 pm

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