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थिएटर के ऑस्कर में इस नाटक को मिल चुके हैं 4 अवॉर्ड, फूलन देवी की कहानी पर है बेस्ड

भारत भवन में नाटक 'अगरबत्ती' का मंचन

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भोपाल। भारत भवन में चल रहे रंगोत्सव समारोह का शुक्रवार को समापन हो गया। अंतिम दिन नाटक 'अगरबत्ती' का मंचन हुआ। नाटक का निर्देशन स्वाती दुबे ने किया है। एक घंटे तीस मिनट के इस नाटक में समागम रंगमण्डल, जबलपुर के 20 कलाकारों ने अभिनय किया। नाटक का 15वां और भोपाल में यह दूसरा शो है। पहला शो थिएटर ओलंपियाड में हुआ था। इसे मेटा-2019 में बेस्ट लाइन डिजाइन, बेस्ट एक्टर इन लीड रोल, बेस्ट डायरेक्टर और बेस्ट स्क्रिप्ट का अवॉर्ड मिल चुका है।

इस नाटक के केंद्र में फूलन देवी और बेहमई हत्याकांड(1981) है। नाटक में इस हत्याकांड के बाद विधवा महिलाओं की काल्पनिक कहानी को मंच पर प्रस्तुति किया गया। नाटक संदेश देता है कि पापी अगर नातेदार हो तब भी वह पापी होता है...। नाटक में यह दिखाया गया कि उन महिलाओं को अपनों के मरने का दु:ख तो है, लेकिन एक महिला पर हुए जुल्म को भी वह महसूस करती है।

नाटक कास्ट, क्लास और जेंडर पर बेस्ड

डायरेक्टर का कहना है कि फूलन देवी गरीब, महिला और दलित तीनों थी। फिल्म देखने के बाद यह महसूस किया कि आखिर हत्याकांड के बाद उन परिवारों में क्या हुआ। इसी की कल्पना कर नाटक तैयार किया। नाटक में दिखाया गया कि हत्याकांड में मारे गए लोगों की विधवाएं अगरबत्ती निर्माण का उद्यम कर अपना निर्वाह कर रही हैं और उनके इसी कर्म के साथ-साथ नाटक का विमर्श आगे बढ़ता है।

लालाराम ठाकुर की विधवा या ठकुराइन अपनी पति की हत्या के प्रतिकार के लिए प्रणरत है, इससे पहले उसे मतृक की खारी का विसर्जन मंजूर नहीं। प्रतिकार से पहले तर्पण संभव नहीं। उसकी हल्दी ठाकुर की विधवा कल्ली पर निर्भरता है। जिस दिन कल्ली लौट आएगी, फूलन का अंत हो जाएगा, वो हटजोगन सी हो गयी है।

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इनको तो जलना ही चाहिए...

ठाकुरों की ठकरास की कलई भी धीरे-धीरे आपसी संवाद में खुलती जाती है। इस गहमागहमी में ठकुराइन के साथ बचपन में घटा एक हादसा हिस्टीरिया के दौरे की शक्ल में उस पर हावी होकर उसकी चिंतना की सारी सामंती प्रोग्रामिंग को उलट कर, उसके भीतर की स्त्री को पुनस्र्थापित कर देता है और नाटक के अंतिम दृश्य में वह अपने मतृ पति की खारी को अगरबत्ती के मसाले में मिलाती नजर आती है, क्यूंकि इनको तो जलना चाहिए, कई बार.. बार-बार थोड़ा-थोड़ा, तिल-तिल कर अगरबत्ती की तरह।