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विदेशों में किया जाएगा शैलचित्रों का काल निर्धारण

पुरातत्वविदों का दावा इन शैलचित्रों में छिपा है हजारों वर्ष पुराना इतिहास, उस समय की संस्कृति और सभ्यता के साथ वन्यजीवन का भी चलेगा पता...

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Spanish team

विदेशों में किया जाएगा शैलचित्रों का काल निर्धारण

भोपाल. पुरातत्व, इतिहास और सभ्यता के नए रहस्य जल्द खुल सकते हैं। विदेशी इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के दल ने भोपाल और इसके आसपास के स्थित शैलचित्रों व शैलाश्रयों का अध्ययन किया है। अब यह दल इन शैलचित्रों के काल निर्धारण के लिए सरकार से अनुमति लेगा। अनुमति मिलने के बाद यह दल राज्य पुरातत्व विभाग, एएसआइ, वन आदि सरकारी विभागों के साथ मिलकर काम करेगा। रंग, फंगस आदि कुछ सूक्ष्म नमूनों को विदेश ले जाकर वहां की लैब में परीक्षण किया जाएगा और कुछ आवश्यक मशीनों को यहां लाकर जांच की जाएगी।

हाल ही में स्पेन की कन्सेंटाइना सिटी से इतिहास और पुरातत्व के क्षेत्र की तीन बड़ी हस्तियां पेरे फेरर, इलियास और एम्पारो ने भोपाल और आसपास के क्षेत्रों का अध्ययन किया। कोलार रोड निवासी एएसआइ के पूर्व अधीक्षण पुरातत्वविद डॉ. नारायण व्यास के साथ मिलकर इस दल ने कोलार रोड, कठौतिया, जावरा, सतकुंडा, खरवाई, उरदैन, श्रीराज छज्जा की हाथीटोल के शैलचित्रों का अध्ययन किया। इन शैलचित्रों को विदेशी दल ने भारत की अनमोल धरोहर बताया, जिसका गहन अध्ययन और काल निर्धारण करने से पुरातत्व, इतिहास, सभ्यता, मानव व वन्यजीवन के रहस्य खुलेंगे। विदेशी दल ने प्रवास के दौरान डॉ. व्यास को सर्टिफिकेट ऑफ ऑनर और स्पेन की प्रतिष्ठित प्लेट से अलंकृत किया।

एस-बेल्ट में शैलचित्रों की भरमार
प्रो. शंकर तिवारी ने विंध्य की एस-बेल्ट की खोज की थी। इस एस-बेल्ट में अति दुर्लभ और बेहतरीन शैलाश्रय व शैलचित्र मौजूद थे। चालीस किलोमीटर लंबी एस-बेल्ट भोपाल में मनुआभान की टेकरी से शुरू होकर गुफा मंदिर, टीबी हॉस्पिटल, गांधी मेडिकल कॉलेज, मानव संग्रहालय, श्यामला हिल्स, धरमपुरी पुलिस लाइन, आइआइएफएम भदभदा, सेहत कराड़, केरवा, कोलार रोड, रीछन खोह, दौलतपुर, बैरागढ़ चीचली, कठौतिया, झिरी, जावरा आदि आते हैं। इन शैलचित्रों को 10 से 15 हजार वर्ष पुराना माना जाता है। रायसेन रोड पर समरधा, सतकुंडा, खरवाई, उरदैन, श्रीराज छज्जा के हाथीटोल में भी दस हजार वर्ष से पुराने शैलाश्रय व शैलचित्र माने जाते हैं।

कैसे बनाए रंग
वरिष्ठ पुरातत्वविद डॉ. नारायण व्यास ने बताया कि सतही तौर पर गौर करने से ऐसा लगता है कि उस समय के मानव ने शैलचित्रों में गेरू, मुरम पाउडर और सफेद खडिय़ा का इस्तेमाल किया होगा। कालांतर में यह रंग इतने गहरे हो गए कि हजारों वर्ष बीतने के बाद भी खत्म नहीं हुए।