किडनी से जुड़ी बीमारियों के लक्षण और बचाव, जाने इसके कार्य

हर वर्ष मार्च के दूसरे गुरुवार को विश्व किडनी दिवस मनाते हैं, जो इस बार 14 मार्च को है...

भोपाल। किडनी से जुड़ी बीमारियों से होने वाली मौतों में विगत कुछ वर्षों में काफी इजाफा हुआ है। लेकिन इसके बाद भी कई लोग किडनी से जुड़ी समस्याओं के लक्षण समझ नहीं पाते और डॉक्टर के पास तब जाते हैं जब समस्या बहुत अधिक बढ़ चुकी होती है।


डॉ. राजकुमार के अनुसर दरअसल किडनी हमारे शरीर में सफाई का काम करती हैं। यह गंदगी बाहर निकालने वाले सिस्टम का एक बहुत अहम हिस्सा हैं। दोनों किडनियों में खून साफ होता है। जानिये किडनी से जुड़ी कुछ खास बातें...

किडनी शरीर का अहम अंग है जिसे फंक्शन यूनिट भी कहते हैं। शरीर में दो किडनी (गुर्दे) होती है। किडनी लिवर के ठीक नीचे होती है। आंतरिक अंगों में सबसे बड़ी होती है। बाएं तरफ की किडनी दाहिनी की अपेक्षा छोटी होती है।

किडनी में करीब 11 लाख नेफ्रॉन (रक्त को फिल्टर करने वाली जाली) होते हैं। किडनी ब्लड प्रेशर नियंत्रित, सोडियम और पोटैशियम को संतुलित रखती है। विटामिन डी को सक्रिय कर हिड्डयों को मजबूत, लाल रक्त कोशिकाएं बनाने में मदद करती है। मोटापा, डायबिटीज व हाइ ब्लड प्रेशर से नेफ्रॉन्स खराब होने लगते हैं जिससे किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित होती है।

किडनी खून में मौजूद टॉक्सिन्स (विषैले तत्वों) को छान कर साफ करती है जो यूरिन के जरिए बाहर निकलते हैं। शरीर में तरलता (फ्लूयूड) के स्तर को संतुलित रखती है। किडनी में विशेष तरह का हॉर्मोन एरीथ्रोपोएटीन होता है जो खून बनाने की प्रक्रिया को बढ़ाता है।

एक स्वस्थ व्यक्ति की किडनी का वजन करीब 150 ग्राम, लंबाई 10 सेंटीमीटर होती है। किडनी की सेहत को लेकर प्रतिवर्ष मार्च के दूसरे गुरुवार को विश्व किडनी दिवस मनाते हैं। इस बार 14 मार्च को है। इसकी थीम 'दुनिया के हर कोने में सबकी किडनी रहे स्वस्थ' रखी है।

अचानक समस्या होना...
किडनी में दो तरह की बीमारियां होती हैं। पहला एक्यूट किडनी डिजीज जो अचानक होती है। इसमें किडनी की कार्यक्षमता तेजी से घटने लगती है। यह शरीर में किसी तरह का संक्रमण (सेप्सिस), उल्टी-दस्त, मलेरिया, एचआइवी संक्रमण, अत्यधिक दर्द निवारक दवाएं लेने, ब्लड प्रेशर व डायबिटीज की बीमारी में शुगर के बार-बार उतार-चढ़ाव के कारण होती है। एक्यूट किडनी डिजीज की समय पर पहचान व इलाज से मरीज पूरी तरह से ठीक हो सकता है।

बीमारी का बढऩा...
क्रॉनिक किडनी डिजीज ठीक नहीं होने वाली बीमारी है। शुरुआत में इसके कोई लक्षण नहीं दिखते हैं। रक्त यूरिया, सिरम क्रिएटिनिन बढऩे लगता है। बीमारी की स्थिति अनुसार इलाज करते हैं।

दवाओं से रोगी की किडनी में बढऩे वाले संक्रमण को रोका जाता है और उसकी स्थिति के अनुसार डायलिसिस करते हैं। खानपान में परहेज और दवाइयों से किडनी के संक्रमण को कम किया जा सकता है पर रोका नहीं जा सकता है। मरीज के रक्त में यूरिया और क्रिएटिनिन की मात्रा बढऩे से किडनी फेल होने का खतरा भी बढ़ जाता है।

इसलिए आती सूजन...
डायबिटीज के मरीजों में शुगर का लेवल बढऩे से किडनी प्रभावित होती है। ग्लोमेरुलोनेफ्राइटिस में किडनी में संक्रमण होता है। इससे नेफ्रॉन्स में सूजन आने से रक्त साफ करने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है।

हाइपरटेंशन से किडनी पर गलत असर पड़ता है। हर वक्त बीपी बढ़ा होने पर किडनी के कार्य करने की क्षमता प्रभावित होती है, दबाव बढ़ता है और कुछ समय बाद किडनी फेल हो जाती है।

इन लक्षणों पर ध्यान दें...
क्रॉनिक किडनी डिजीज में किडनी पहले फूलती है फिर सिकुड़कर छोटी हो जाती है। इसके लक्षण देर से दिखते हैं। रोगी के पैरों में सूजन, चेहरे पर सूजन, खून की कमी, भूख लगना बंद हो जाना, पेशाब की मात्रा में कमी, शरीर में खुजली, शरीर का रंग काला पडऩा प्रमुख लक्षण हैं। मरीजों में हृदय संबंधी समस्या भी होती है। महिलाओं को माहवारी में ज्यादा दर्द, संबंध के दौरान तकलीफ होती है।

इन जांचों से करते बीमारी की पहचान...
किडनी बीमारियों की पहचान के लिए ब्लड यूरिया, सिरम क्रिएटिनिन, सिरम इलेक्ट्रोलाइट व किडनी फंक्शन टेस्ट कराते हैं। 40 की उम्र के बाद ब्लड प्रेशर, डायबिटीज के मरीजों को ब्लड प्रेशर, एचबीए1सी की जांच कराते हैं। परिवार में किसी को किडनी रोग है तो अन्य को खास खयाल रखना चाहिए।

दवाओं से इलाज...
क्रॉनिक किडनी डिजीज के रोगी का इलाज दवाओं व डायलिसिस से किया जाता है। किडनी फेल होने पर प्रत्यारोपण अंतिम विकल्प है। क्रॉनिक रीनल फेल्योर में गुर्दा रोगी का हीमोडायलिसिस किया जाता है। इसमें सप्ताह में तीन बार और माह में बारह बार रक्त की कृत्रिम रूप से सफाई की जाती है।

डायलिसिस ऐसे करते...
क्रॉनिक किडनी डिजीज के मरीजों में बीमारी बढऩे पर डायलिसिस करते हैं। मरीज के खून को मशीन में सर्कुलेट किया जाता है। इस प्रक्रिया में खून में मौजूद विषैले तत्वों को साफ करने के बाद साफ खून शरीर में चला जाता है। हफ्ते में 2-3 बार डायलिसिस होता है। इसमें करीब 4 घंटे लगते हैं। रोगी की स्थिति अनुसार यह कम या ज्यादा हो सकता है।

सरकारी मदद...
गुर्दे में पथरी नेफ्रॉन्स को नुकसान पहुंचाती है जो जिससे किडनी खराब होने की आशंका बढ़ जाती है। आहार में फॉस्फोरस, कैल्शियम और यूरिक एसिड की मात्रा ज्यादा होने के कारण होती है। किडनी में स्टोन जब यूरिन के रास्ते में रुकावट पैदा करते हैं तो पेट के निचले हिस्से में तेज दर्द होता है।

स्थिति अनुसार तय करते दवा की पोटेंसी...

होम्योपैथी: होम्योपैथी में इलाज किया जाता है। सामान्य सावधानियां बरतनी होती हैं। एलोपैथी के साथ होम्योपैथी दवाएं ले सकते हैं। खट्टी चीजों से परहेज करें।

बैक्टीरिया, फंगल से यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (यूटीआई) होता है। बुखार, कंपकंपी व पैरों में सूजन आती है। इसके लिए लाइकोपोडियम, कैन्थारिस, नैट्रमम्यूर दवाएं देते हैं। स्टोन यदि दाहिनी तरफ है तो लाइकोपोडियम व बर्बैरिस बल्गैरिस, हाइड्रेन्जिया जैसी दवाएं देते हैं। दवाओं की पोटेंसी व मात्रा चिकित्सक तय करते हैं। अपने मन से दवाएं न लें।

क्रॉनिक बीमारी में औषधियां भी कारगर: आयुर्वेद...
मरीजों में घरेलू नुस्खे के साथ आयुर्वेदिक दवाएं कारगर होती हैं। अदरक, प्याज, लहसुन का प्रयोग किडनी के लिए फायदेमंद है।

क्रॉनिक किडनी बीमारी का आयुर्वेद में इलाज किया जाता है। इसमें प्रयोग होने वाली औषधियों चन्द्रप्रभा वटी, वरुणादी क्वाथ, तृण पंचमूल क्वाथ, पुनर्नवा, मुक्तापंचामृत आदि देते हैं।

पंचकर्म चिकित्सा पद्धति से भी मरीजों को लाभ मिलता है। ये औषधियां आयुर्वेद विशेषज्ञ की सलाह के बाद ही लें। नियमित अनुलोम-विलोम से भी काफी फायदा मिलता है।


क्रॉस मैचिंग भी तरीका...
किडनी फेल होने के बाद प्रत्यारोपण ही इलाज है। रोगी के रिश्तेदार (खून के रिश्ते) का गुर्दा प्रत्यारोपित करते हैं। समय रहते गुर्दा प्रत्यारोपण न होने से रोगी की जान जा सकती है। रोगी और डोनर का ब्लड ग्रुप जब मैच नहीं करता तो क्रॉस ट्रांसप्लांट करते हैं।

यह भी एक विकल्प...
रोगी को उसके ब्लड ग्रुप का डोनर नहीं मिलता तो एबीओ (ब्लड ग्रुप) इनकॉम्पीटेंट ग्रुप किडनी प्रत्यारोपण प्रक्रिया अपनाते हैं। रक्त में मौजूद एंटीबॉडीज हटाते हैं ताकि प्रत्यारोपण के बाद डोनर के ब्लड ग्रुप की किडनी को मरीज का शरीर स्वीकार कर ले।

रोबोटिक ट्रांसप्लांट...
लेप्रोस्कोपिक किडनी प्रत्यारोपण में सूक्ष्म छेद कर किडनी निकालते हैं और ओपन सर्जरी की मदद से किडनी लगाते हैं। रोबोटिक सर्जरी में किडनी निकालने व लगाने की प्रक्रिया रोबोटिक उपकरण से होती है। रोगी व डोनर को कोई परेशानी नहीं होती है।

कैडबर ट्रांसप्लांट...
ब्रेन डेड मरीज की दोनों किडनियों को दो मरीजों को लगाकर जीवन देने का काम हो रहा है। अभी और जागरूकता की जरूरत है। ब्रेन डेड मरीज का परिवार कई बार अंगदान को तैयार नहीं होता है। यदि सभी आगे आएं तो ऐसे मरीजों को नया जीवन मिल सकता है।

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दीपेश तिवारी
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