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जनजातीय संग्रहालय : नाटक ‘जस संगत तस रंगत’ का मंचन

...और हाथी पर भी चढ़ा संगत का रंग.. बुद्ध की जातक कथाओं और रंग संभावनाओं पर हुआ व्याख्यान

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भोपाल। मप्र जनजातीय संग्रहालय में बुद्धत्व की कथाओं के रंग महोत्सव पर केन्द्रित 'यशोधरा' में बुधवार को बुद्ध की जातक कथाएं एवं रंग संभावनाओं पर व्याख्यान और महिलामुख जातक पर आधारित नाटक 'जस संगत तस रंगत' का मंचन संग्रहालय में हुआ। निर्देशक अभिषेक गर्ग के निर्देशन में नाटक बुद्ध की जातक कथा 'महिलामुख जातक' पर आधारित रहा।

कथा के अनुसार बहुत समय पहले वाराणसी में राजा ब्रह्मदत्त का राज था और उनके बहुत ही बुद्धिमान मंत्री थे बोधिसत्व, राजा ब्रह्मदत्त के पास एक बहुत ही सीधा-सादा हाथी था। एक दिन उस हाथी के ठिकाने के पास बैठकर कुछ चोर चोरी की योजना बनाते हैं। वे चोर ये भी बातें करते हैं कि एक चोर का स्वाभाव कैसा होना चाहिए, जैसे की हमें बहुत साहसी और कठोर होना चाहिए, किसी पर दया नहीं करनी चाहिए और अवश्यकता पडऩे पर किसी के प्राण लेने से भी नहीं हिचकिचाना चाहिए।

चोर प्रतिदिन वहां आकर इसी प्रकार की बातें किया करते। पास बैठा हाथी उनकी सारी बातें प्रतिदिन सुनता है और मान लेता है कि ये सारी शिक्षा उसे दी जा रही है। धीरे-धीरे हाथी का व्यवहार बदलने लगता है। वो बहुत ही क्रोधी और आक्रामक हो जाता है और अपने ही महावत के प्राण ले लेता है। तब बोधिसत्व उसके इस प्रकार के परिवर्तित व्यवहार का कारण पता लगाते हैं और फिर उसे ठीक करने का उपाय सोचते हैं और सिद्ध कर देते हैं कि संगत का असर सभी पर होता है।

बुद्ध के पूर्व जन्मों की हैं जातक कथाएं

इससे पहले कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी के व्याख्यान से हुई, जिसमें उन्होंने बताया कि जातक कथाएं महात्मा बुद्ध के पूर्व जन्मों से जुड़ी हुई कथाएं हैं। डॉ. त्रिपाठी ने जातक कथाओं और थिएटर में इन कथाओं की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा की और श्रोताओं को इन कथाओं की बारीकियों से अवगत कराया। उन्होंने कथा साहित्य के बारे में बात की। डॉण् राधावल्लभ त्रिपाठी ने कई कहानियों और किस्से भी साझा किए और उन किस्सों की सीखों एवं आदर्शों की प्रासंगिकता की गहराई से चर्चा की।