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हम किसी भी कार्यकारी नियुक्ति में CJI को कैसे शामिल कर सकते हैं: धनखड़

Jagdeep Dhankhar : उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा है कि हमारे देश में या किसी भी लोकतंत्र में क्या कोई कानूनी तर्क हो सकता है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश को सीबीआइ निदेशक के चयन में भागीदारी करनी चाहिए। इसके लिए कानूनी आधार हो सकता है?

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Vice President of India Jagdeep Dhankhar

Vice President of India Jagdeep Dhankhar

Jagdeep Dhankhar on CJI : उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़(Jagdeep Dhankhar) ने कहा है कि हमारे देश में या किसी भी लोकतंत्र में क्या कोई कानूनी तर्क हो सकता है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश को सीबीआइ निदेशक के चयन में भागीदारी करनी चाहिए। इसके लिए कानूनी आधार हो सकता है? मैं समझ सकता हूं कि यह विधायी प्रावधान इसलिए अस्तित्व में आया, क्योंकि तत्कालीन कार्यकारी सरकार ने न्यायिक निर्णय को स्वीकार किया। अब समय आ गया है कि इसे फिर से देखा जाए। यह निश्चित रूप से लोकतंत्र से मेल नहीं खाता। हम मुख्य न्यायाधीश को किसी भी कार्यकारी नियुक्ति में कैसे शामिल कर सकते हैं। धनखड़ भोपाल में राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी में संकाय और छात्रों से चर्चा कर रहे थे।

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संविधान पीठ की संगठन संबंधी चिंताओं को उजागर करते हुए धनखड़ ने कहा, जब मैं 1990 में संसदीय कार्य मंत्री बना था, तब 8 न्यायाधीश थे। अक्सर ऐसा होता था कि सभी 8 न्यायाधीश साथ बैठते थे। अनुच्छेद 145(3) के तहत यह प्रावधान था कि संविधान की व्याख्या 5 न्यायाधीशों या अधिक की पीठ द्वारा की जाएगी। जब यह संख्या आठ थी, तब यह पांच थी और संविधान देश की सर्वोच्च अदालत को संविधान की व्याख्या करने की अनुमति देता है।

संविधान के बारे में संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 145(3) के तहत जो सार और भावना मन में रखी थी, उसका सम्मान किया जाना चाहिए। यदि गणितीय दृष्टिकोण से विश्लेषण किया जाए तो वे बहुत सुनिश्चित थे कि व्याख्या न्यायाधीशों के बहुमत द्वारा की जाएगी, क्योंकि तब संख्या 8 थी। वह पांच आज भी वैसी की वैसी है। और संख्या अब चार गुना से भी अधिक है।

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समीक्षा की वकालत

धनखड़(Jagdeep Dhankhar) ने यह भी कहा कि न्यायपालिका की सार्वजनिक उपस्थिति मुख्य रूप से निर्णयों के माध्यम से होनी चाहिए। निर्णय अपने आप में बोलते हैं। निर्णयों का वजन होता है। यदि निर्णय देश के उच्चतम न्यायालय से आता है तो यह एक बंधनकारी निर्णय होता है। निर्णयों के अलावा कोई अन्य प्रकार की अभिव्यक्ति संस्थागत गरिमा को अनिवार्य रूप से कमजोर करती है। फिर भी जितना भी प्रभावी हो सकता है, मैंने संयम का प्रयोग किया है।

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वर्तमान स्थिति की पुन: समीक्षा करने की मांग करता हूं ताकि हम फिर उस ढंग में लौट सकें, जो हमारे न्यायपालिका को ऊंचाई दे सके। जब हम पूरी दुनिया में देखते हैं तो हम कभी भी न्यायाधीशों को उस तरह से नहीं पाते जैसे हम यहां हर मुद्दे पर पाते हैं। कार्यक्रम को संबोेधित करते धनकड़ और मौजूद सीएस अनुराग जैन, बीयू कुलपति एस.के. जैन और अन्य।

संस्थाएं राष्ट्र हित देखकर सीमा में काम करें

धनखड़(Jagdeep Dhankhar) बोले-न्यायिक आदेश द्वारा कार्यकारी शासन संवैधानिक विरोधाभास है। इसे दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और बर्दाश्त नहीं कर सकता। संविधान में सामंजस्य बिठाने की परिकल्पना है। संस्थागत समन्वय के बिना परामर्श प्रतीकवाद है। न्यायालयीय सम्मान के लिए जरूरी है कि संस्थाएं राष्ट्रहित ध्यान में रखकर संवाद बनाते हुए संवैधानिक सीमाओं में काम करें। सरकारें विधायिका के प्रति उत्तरदायी हैं पर यदि कार्यकारी शासन अधिकार या आउटसोर्स होता है तो जवाबदेही की प्रवर्तन क्षमता नहीं होगी।