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विजय दिवस विशेष : पाकिस्तान ने खेतों में छोड़ दिया था पानी, खराब हो गई थीं भारत की तोपें

1971 के भारत-पाक युद्ध की ऑनररी कैप्टन एलआर पंवार ने बताई आंखों देखी...

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बैतूल. मेरे पास तोप सुधारने की जिम्मेदारी थी। युद्ध के दौरान जहां भी तोप खराब होती थी उन्हें सुधारना होता था। भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान ढाका में भारतीय सेना ने खेत में तोप लगाई। विपक्षियों ने खेत में पानी छोड़ दिया। इससे तोपों में पानी भर गया। तीन तोप खराब हो गई, जिन्हें सुधारना पड़ा। यह बात 1971 में युद्ध के दौरान भारत-पाकिस्तान युद्ध के साक्षी ऑनररी कैप्टन एलआर पंवार ने बताई। पंवार ने वर्ष 1965 में पाकिस्तान से हुए पहले युद्ध में भी सेवाएं दी थी।


सांईखेड़ा हाल विनोबा नगर निवासी 79 साल के पंवार ने बताया कि भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान डमडम एयरपोर्ट पर डिफेंस के लिए तैनात किया। यहां 18 तोप लगी थी। एयरपोर्ट की सुरक्षा के बाद यहां से फिर दूसरी कंपनी पंडित बैटरी के साथ ढाका में रहे। यहां पर खेत में तोपें लगी हुई थी। ऊपर से विपक्षियों ने पानी छोड़ दिया, जिससे तोपों में पानी भर गया। तीन तोप खराब हो गई। तीनों तोपों को तीन घंटे में सुधार दिया। फिर सूचना मिली कि पठानकोट शंकरगढ़ में हवाई हमले हो रहे हैं तो सिख बैटरी के साथ यहां पर पहुंचे। सिखों ने जब हमले किए तो पाकिस्तान की ओर से हवाई हमले बंद हो गए। युद्ध के दौरान एक गन सुधारी थी, जो कि एक-दो फायर के बाद बंद हो जाती थी। दो दिन बाद ही 16 दिसंबर को भारत ने पाकिस्तान को हरा दिया था। इसके बाद वापस आ गए। भारतीय सैनिकों ने डटकर मुकाबला किया। कुछ ही दिनों में पाकिस्तान को हार का मुंह का देखना पड़ा। पंवार ने बताया कि युद्ध के दौरान कोई विशेष जानकारी नहीं मिल पाती थी, सिर्फ आदेशों का पालन करना होता था। युद्ध के दौरान कौन सा बम गिर जाए और मौत हो जाए इसका कोई भरोसा नहीं था। इसके बाद भी डर नहीं लगता था, सिर्फ भगवान को याद करते थे।

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पिता को पता चला तो वे बहुत रोए
पंवार ने बताया वर्ष 1961 में सेना में भर्ती के लिए सर्किट हाउस में अधिकारी आए। जब मेरी उम्र 18 वर्ष डेढ़ माह ही थी। यहां पर भर्ती देखने गए। अधिकारियों ने पूछा भर्ती होना है, हां कहने पर पैर और ऊंचाई आदि देखी सिलेक्शन कर लिया। इसके बाद सिकंदराबाद भिजवाया दिया। उस समय नेट और मोबाइल कुछ नहीं था। पिता गनाजी को यह बात पती लगी तो वे बहुत रोए। सिकंदराबाद में ही ट्रेनिंग करने के बाद पुंछ राजौरी में पदस्थ हुए।

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कोर्स किया और युद्ध के लिए पहुंचे
नौकरी के दौरान डिप्लोमा इन मेकेनिकल इंजीनियरिंग कोर्स किया। पंवार हवलदार मेजर टेक्नीकल हो गए। उन्हें रेजीमेंट कचरापाढ़ा हैडक्वाटर में पदस्थ कर दिया। ट्रेनिंग लेकर पहुंचे ही थे और भारत-पाकिस्तान युद्ध छिड़ गया, जिसके चलते युद्ध में जाना पड़ा। जुलाई वर्ष 1993 में रिटायर हुए। इस दौरान ऑनररी कैप्टन की रैंक भी मिली।

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