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बनना था ‘टाटा-अंबानी’ लेकिन, खुद की पूंजी भी गंवा बैठे

युवा इंजीनियर कांट्रेक्टर योजना मकसद में फेल...

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भोपाल

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Ashok Gautam

May 22, 2018

industrialist

बनना था ‘टाटा-अंबानी’ लेकिन, खुद की पूंजी भी गंवा बैठे

भोपाल. सरकार की मुख्यमंत्री युवा इंजीनियर कांट्रेक्टर योजना बुरी तरह से फेल हो गई है। योजना के शुभारंभ पर मुख्यमंत्री ने युवा इंजीनियरों को टाटा-बिड़ला बनाने की बात कही थी। लेकिन अब हालात ये हैं कि प्रशिक्षण हासिल करने वाले ठेकेदारों को काम ही नहीं मिल पा रहा है।


तीन साल में 14०० से अधिक युवा इंजीनियरों को करोड़ों रुपए खर्च कर ट्रेनिंग दी गई थी। इनमें से महज 113 ठेकेदारों ने रजिस्ट्रेशन कराया है। मजेदार तथ्य यह है कि रजिस्ट्रेशन के बाद २० इंजीनियर भी मैदान में नहीं हैं।


लोन नहीं मिला, जमा पूंजी भी झोंक दी
मुख्यमंत्री युवा इंजीनियर कांट्रेक्टरों को ना तो बैंकों से लोन मिल रहा है और न ही सिक्योरिटी राशि जमा करने के लिए इनके पास रकम है। कई युवा घर की जमापूंजी भी बार-बार टेंडर फार्म और औपचारिकताओं में खर्च कर चुके हैं।

काम नहीं मिलने से वे अब टेंडर भी नहीं डाल रहे। बड़े ठेकेदारों से मुकाबला उनके लिए भारी पड़ रहा है। सरकार एक युवा इंजीनियर को प्रशिक्षण देने में २० हजार रुपए से अधिक राशि खर्च करती है। तीन माह तक पांच हजार रुपए मानदेय भी देती है।

पैसा भी डूब जाता है, काम भी नहीं मिलता
तीन बार टेंडर में हिस्सा लिया। लोएस्ट रेट होने के कारण बड़े ठेेकेदारों को काम मिल जाता है। हमारा पैसा भी डूब जाता है और काम भी नहीं मिलता।
- राजेश मालवीय, उज्जैन


बैंक लोन नहीं दे रहे हैं। इसके चलते काम नहीं शुरू किया।
- मंगू डामोर, झाबुआ


अब ठेकेदारी नहीं करूंगा, काम नहीं ही मिलता। जो लोग जमे हैं, वे लोएस्ट रेट डाल देते हैं, तो काम उन्हीं को मिलता है।
- सैयद अली जैदी, भोपाल


सभी जिलों में युवा इंजीनियर कांट्रेक्टर के लिए नोडल कार्यालय खोलने का वादा किया, लेकिन नहीं खुले।
- प्रदीप विश्वकर्मा, छतरपुर


दस बार टेंडर डाला, लेकिन एक बार भी काम नहीं मिला। टेंडर का पैसा भी डूब गया।
- अर्जुन परमार, उज्जैन


रेट बहुत बिलो जा रहा है। रोड के लिए तो ठेके भी नहीं ले पाता, क्योंकि इसके लिए बैंक गारंटी मांगी जाती है।
- अभिनव शर्मा, अशोक नगर

युवा इंजीनियर कांटेक्टर योजना में प्रशिक्षण के लिए युवाओं को अब नहीं बुलाया जा रहा है। युवा इंजीनियर निर्माण कार्य के लिए टेंडर में हिस्सा भी नहीं ले रहे हैं। जब तब तक उनके लिए कुछ फीसदी काम देने केलिए आरक्षित नहीं होता है, तब तक युवा इंजीनियरों को मैदान में टिकना मुश्किल हो जाएगा।

- अखिलेश अग्रवाल, इंजीनियर इन चीफ, लोक निर्माण विभाग