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5 से 10 किलोग्राम का मुखौटा पहनकर दशहरा पर किया जाता है सौंगीमुखौटा नृत्य

पांच दिवसीय स्थापना दिवस समारोह का नृत्य प्रस्तुतियों के साथ समापन  

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भोपाल। जनजातीय संग्रहालय का नौवां स्थापना दिवस समारोह का शुक्रवार को समापन हो गया। इसमें विभिन्न प्रदेशों के लोक एवं जनजातीय नृत्य, संगीत, चित्र प्रदर्शनी, शिल्प मेला और उल्लास के अंतर्गत अंतर्गत कलाकार विनोद भट्ट ने कठपुतली प्रदर्शन किया। समारोह में समापन दिवस पर शालिनी व्यास और उनके ग्रुप ने मालवी गायन की प्रस्तुति दी। उन्होंने चालो गजानन्द..., सुहाग मांगण चली रे अपणा दादाजी..., काले राने ग्यो थोरे काका..., गंगा जी में बाजा बाजीया..., मैय्या आजो एक बार हामरा घर... जैसे अन्य गीतों की प्रस्तुति दी।

पेड़ के आसपास नृत्य कर खोलते हैं उपवास
समारोह के अगले क्रम में गोण्ड ठाट्या-मध्यप्रदेश, गरासिया-राजस्थान, माथुरी नृत्य-तेलंगाना, करमा-उत्तरप्रदेश, तारपा-महाराष्ट्र, कोरकू थापटी नृत्य, करमा-बिहार, डालखई-उड़ीसा, पाइका नृत्य-झारखण्ड, सौंगीमुखौटा-महाराष्ट्र, ढोलूकुनिथा-कर्नाटक की प्रस्तुति दी गई। ओडिशा से आए कलाकार आलोक कुमार पण्डा ने बताया कि डालखई नृत्य में प्रकृति की पूजा जाती है। कंध समुदाय में पेड़ को डाल कहते हैं और पेड़ को अन्नदाता मानते हैं, इसलिए इसका नाम डालखई नृत्य पड़ा। दशहरा अष्टमी में घर के सभी लोग उपवास रख पेड़ की पूजा करने के बाद चारों ओर घूमकर नृत्य करते हैं और वहीं अपना उपवास भी तोड़ते हैं।

चौथी पीढ़ी कर रही है नृत्य
वहीं, महाराष्ट्र से आए कलाकार सुबोध प्रमाणिक ने बताया कि सौंगीमुखौटा नृत्य उन्होंने अपने पिता और दादा से सीखा है। वे इस नृत्य को करने वाली चौथी पीढ़ी हैं। इस नृत्य में कलाकार 5 से 10 किलो के मुखौटे, वेशभूषा पहनकर नवरात्रि और खुशी के असवर पर करते हैं। इस अवसर पर संग्रहालय में गोण्ड जनजातीय चित्रकार पद्मश्री दुर्गा बाई के चित्रों की प्रदर्शनी शलाका भी आयोजित की गई है।