
येलो और रेड कलर की ड्रेस में तैयार इस समूह की अंतिम प्रस्तुति रामायण पर रही। जिसमें सीता स्वयंवर से लेकर जटायु मोक्ष की मार्मिकता को ओडिशी नृत्य की भाव भंगिमाओं से दर्शाया गया।
भोपाल। मप्र जनजातीय संग्रहालय में जनजातीय जीवन, देशज ज्ञान परम्परा और सौन्दर्यबोध पर एकाग्र 'पांचवे वर्षगांठ समारोह' के दूसरे दिन संग्रहालय के मुक्ताकाश मंच पर नागालैंड, त्रिपुरा, मणिपुर और मिजोरम राज्यों के नृत्यों की प्रस्तुतियां हुईं। नागालैंड से आए कलाकारों ने 'युद्ध' नृत्य (वॉर डांस) प्रस्तुत किया।
यह नृत्य संगतम नागा जनजाति के योद्धाओं द्वारा युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद जब वह अपने गांव लौटते हैं तब वे नृत्य शैली में नृत्य करते हैं। वहीं त्रिपुरा से आए कलाकारों ने 'ममिता' नृत्य से अपनी प्रस्तुति को प्रारंभ किया। झूम फसल की कटाई के बाद अक्टूबर महीने में ममिता उत्सव मनाया जाता है।
इस उत्सव के माध्यम से मैलुमा देवी को अच्छी फसल चढ़ाई जाती है। ममिता नृत्य के बाद त्रिपुरा के कलाकारों ने अपनी प्रस्तुति का अंत 'लेबंग' नृत्य से किया। लेबंग असल में एक कीटक होता है जो फसलों को नुकसान पहुंचाता है। ऐसे में लड़कों द्वारा बांस की मदद से ध्वनि निकाली जाती है और लड़कियां इन कीटकों को पकड़ लेती हैं।
फूलों से शहद एकत्र करने को दर्शाता है 'द बी डांसÓ
मणिपुर से आए कलाकारों ने 'खोइगु ना-लाम' नृत्य(द बी डांस) से अपनी प्रस्तुति की शुरुआत की। 'खोइगु ना-लाम' नृत्य असल में फूलों से मधुमक्खी के शहद एकत्रित करने को दर्शाता है। यह नृत्य शैली विभिन्न महत्वपूर्ण अनुष्ठानों और त्योहारों पर की जाती है।
'खोइगु ना-लाम' नृत्य के बाद 'गान-लाम' नृत्य प्रस्तुत किया। यह नृत्य शैली काबुई नागा जनजाति की पारंपरिक नृत्य शैली है। कार्यक्रम के अंत में मिजोरम से आए कलाकारों ने 'बुह-ज़ा-एह' नृत्य से अपनी प्रस्तुति दी। यह नृत्य बांस की ध्वनि पर किया जाता है।
बाल फिल्म 'सेनानी साने गुरूजी'का प्रदर्शन
वर्षगांठ समारोह में गुरुवार को रमेश देव द्वारा निर्देशित वर्ष 1995 में आई बाल फिल्म 'सेनानी साने गुरूजी'का प्रदर्शन हुआ। यह फिल्म पांडुरंग सदाशिव साने के जीवन पर केन्द्रित है। साने गुरूजी मराठी के प्रसिद्ध लेखक, शिक्षक,सामाजिक कार्यकर्ता और भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे।
इस फिल्म में निर्देशक रमेश देव ने साने गुरुजी के जीवन के संघर्षों, पढने- लिखने की ललक, समाज की कुरीतियों को समाप्त करने की चाह और उनके आत्मविश्वास को खूबसूरती से फि़ल्म के माध्यम से प्रस्तुत किया है। करीब 1 घंटा 55 मिनट की इस फिल्म में मेघना एरंडे, हर्षद दोडे, सलिल कुलकर्णी, अलका, यशवंत दत्त, श्रीकांत मोघे और परेश मोकाशी मुख्य भूमिकाओं में हैं।
किस्सागोई शैली में सुनाई 'छत्रसाल' की कहानी
किस्सागोई शृंखला के तहत उर्मिला पाण्डे ने बुन्देलखण्ड के प्रतापी शासक 'छत्रसाल' के कई किस्से-कहानी सुनाए। उर्मिला ने बताया कि पांच वर्ष में ही इन्हें युद्ध कौशल की शिक्षा हेतु अपने मामा साहेब सिंह धंधेर के पास देलवारा भेज दिया गया था। छत्रसाल के माता-पिता साथ में युद्ध भूमि में जाया करते थे।
उर्मिला पाण्डे छत्रसाल के बचपन के कई किस्सों के साथ ही साथ रण भूमि के भी कई किस्सों को श्रोताओं से साझा किया। जब औरंगजेब छत्रसाल को पराजित करने में सफल नहीं हो पाया। तो उसने रणदूलह के नेतृत्व में 30 हजार सैनिकों की टुकडी मुगल सरदारों के साथ छत्रसाल का पीछा करने के लिए भेजी थी। छत्रसाल अपने रणकौशल व छापामार युद्ध नीति के बल पर मुगलों के छक्के छुड़ाते रहे।
Published on:
08 Jun 2018 09:32 am
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