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विदिशा के पास है हजारों साल पुरानी अनोखी कला का खजाना, देखें PHOTOS

#World Heritage Day : ईसा पूर्व का गरुड़ स्तंभ हेलियोडोरस के नाम से विदिशा में है। प्रदेश के सबसे बड़े नरवराह की प्रतिमा उदयगिरि में है। विदिशा से मात्र 9 किमी दूर सांची के बौद्ध स्तूप विश्व धरोहर के रूप में विख्यात हैं।

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sanjana kumar

Apr 18, 2016

भोपाल। आज है वर्ल्ड हेरिटेज डे, एक ऐसा दिन जब हम हर साल अपने गौरवशाली इतिहास को संवारकर उन्हें बचाने की दिशा में प्रयास का संकल्प तो हर साल लेते हैं, लेकिन वास्तव में जितने प्रयास होने चाहिएं उतने कर ही नहीं पाते...। आपको बता दें कि आज से दो हजार वर्ष पहले का इतिहास तो कहीं भी मिल जाएगा, लेकिन प्रदेश के हिस्से कुछ ऐसी इमारते हैं, जो युगों-युगों की कहानी कहती नजर आती हैं। ईसा पूर्व की कुछ ऐसी ही इमारतों की ये रोचक हिस्ट्री जानकर आप रोमांचित ही नहीं होंगे, बल्कि एक संकल्प ले लेंगे इन्हें बचाने का...

इन धरोहरों पर गर्व करें
ईसा पूर्व का गरुड़ स्तंभ हेलियोडोरस के नाम से विदिशा में है। प्रदेश के सबसे बड़े नरवराह की प्रतिमा उदयगिरि में है। विदिशा से मात्र 9 किमी दूर सांची के बौद्ध स्तूप विश्व धरोहर के रूप में विख्यात हैं। खजुराहो की शिल्प कला से भी खूबसूरत पाषाण कला का नीलकंठेश्वर मंदिर उदयपुर में हैं। विष्णु के दशावतार बताने वाला मंदिर बड़ोह और ग्यारसपुर के हिंडोला तोरणद्वार में है। बीजा मंडल का विशाल परिसर मुगलों के आतंक से विजय मंदिर से बीजा मंडल बनने की कहानी कहता है। पत्थर भी कैसे मुस्कराता है, इसे बताने वाली शालभंजिका हमारे ग्यारसपुर की ही धरोहर थी। भले ही भीमबैठका यहां नहीं, लेकिन जाफरखेड़ी के शैलाश्रय और शैलचित्र भी प्रागैतिहासिक काल की धरोहर हैं। इन्हें सहेजें, इन्हें संवारें, इन्हें सराहें। आओ, अपनी धरोहर पर गर्व करें...

बौद्ध स्तूप
सांची में स्थित हैं
ईसा पूर्व तीसरी सदी में निर्मित
विशेषता
विदिशा से मात्र 10 किमी दूर सांची के बौद्ध स्तूप विश्व धरोहर में शुमार हैं। यहां स्तूप में भगवान बुद्ध के शिष्य सारिपुत्र और महा मोद्गमल्यायन के पवित्र अस्थि अवशेष रखे हुए हैं। यह स्थान विदिशा और उसके आसपास बौद्ध धर्म के वर्र्चस्व का प्रमाण है। सम्राट अशोक के समय बनाए गए ये स्तूप इस बात के भी गवाह हैं कि विदिशा के साहूकार की बेटी देवी से उनके विवाह के पश्चात देवी के प्रयासों से ही इनका निर्माण हुआ। स्तूप पर इस बात के प्रमाण हैं कि बैसनगर के कारीगरों ने यहां शिल्प कार्य किया है। महेन्द्र और संघमित्रा यहां से श्रीलंका के लिए रवाना हुए थे। यहीं पर भारत और श्रीलंका के संयुक्त प्रयासों से भगवान बुद्ध का भव्य मंदिर भी बना हुआ है। श्रीलंका की महाबोधि सोसायटी भी यहां की देखरेख करती है। यहां हर साल नवंबर के अंतिम हफ्ते में मेला लगता है।



उदयगिरि में स्थित है
पांचवीं सदी में निर्मित है
विशेषता
उदयगिरि की गुफाओं में मूल चट्टान को तराश कर उकेरी गई नर वराह की प्रतिमा अद्वितीय है। चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने विदेशी शक राजाओं को हराकर उत्तरी भारत को मुक्त कराया था। उनकी विजय को यादगार बनाने के लिए ही इसे बनाया गया। यहां शेषाशायी विष्णु, कुमार, गणेश, एकमुखलिंग, महिषासुर मर्दिनी और जैन गुफाएं भी खासतौर पर दर्शनीय हैं।


अद्वितीय नीलकंठेश्वर मंदिर

Neelkantheshwar

उदयपुर-(गंजबासौदा) में स्थित है
ग्यारहवीं शताब्दी में परमार राजाओं द्वारा निर्मित
विशेषता
परमार राजा भोज के पुत्र उदयादित्य ने 11 वीं शताब्दी में इस शिव मंदिर का निर्माण कराया। गर्भगृह में शिवलिंग तक सूर्य की किरणें पहुंचती हैं। विशालता, शिखर और पाषाण शिल्प के इस नायाब नमूने में चंदेल राजाओं द्वारा निर्मित खजुराहो के मंंदिर-सी समानता नजर आती है।

दुर्लभ शैलाश्रय और शैलचित्र


shailashrya


जाफरखेड़ी-(विदिशा) में स्थित है
प्रागैतिहासिक काल में आदि मानव द्वारा निर्मित
विशेषता

विदिशा से मात्र 15 किमी दूर पहाड़ी पर आदिमानव द्वारा उपयोग किए जाने वाले शैलाश्रय और उनके द्वारा बनाए शैलचित्र मौजूद हैं।


शिल्प का नायब नमूना मालादेवी

heritage


ग्यारसपुर में स्थित है
नवीं शताब्दी में प्रतिहार राजाओं द्वारा निर्मित
विशेषता

पहाड़ी के एक सिरे पर स्थित शिल्प के अद्भुत नमूने के रूप में यह मंदिर मालादेवी को समर्पित है। गर्भगृह में भी मूल चट्टान मौजूद है। यहां से प्रकृति का अनुपम सौंदर्य दिखता है। पास ही हिंडोला तोरण द्वार, अठखंभा और बाजरा मठ भी शिल्प के बेजोड़ नमूने हंै।

भव्यता की कहानी कहता बीजामंडल


heritage

विदिशा में स्थित है
सातवीं शताब्दी में परमार राजाओं द्वारा निर्मित
विशेषता
विजया मंदिर के नाम से बने इस मंदिर के अवशेष भी भव्यता की कहानी कहते हैं। औरंगजेब ने इस मंदिर को तोड़कर उस पर मस्जिद का निर्माण कराया था।

ये हैं सबसे बड़े कुबेर


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जिला संग्रहालय में स्थित है
ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में निर्मित
विशेषता
दो हजार साल प्राचीन कुबेर की यह प्रतिमा अपने निर्माण काल, आकार और शिल्प की दृष्टि से बेजोड़ है। करीब 14 फीट ऊंची इस प्रतिमा की अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमत करोड़ों में है। कुबेर को धन का देवता माना जाता है। यहां राजसी मुद्रा में भी कुबेर प्रतिमा हैं।

ये भी हैं खास

-बड़ोह-पठारी
-दशावतार, गाडरमल, जैन मंदिर
-चितौरिया
-यहां पुरा प्रतिमाओं का अनूठा खुला संग्रहालय है।
लटेरी
-जमदग्नि आश्रम, फटी दांत
सिरोंज
-गिरधारी और नीलकंठेश्वर मंदिर