
भोपाल। आज है नौ अक्टूबर, और आज के दिन मनाया जाता है, विश्व डाक-तार दिवस। यहां डाक का मतलब तो सबके समझ की बात है, लेकिन तार का नाम पढ़ते ही हमारी युवा पीढ़ी थोड़ी कन्फ्यूज जरूर हुई होगी। कई बूढ़े-बुजुर्गो की यादें तार से जुड़ी होंगी। जमाना बदल गया, नई-नई टेक्रिक्स आ गई। लोग मैसेंजर, व्हाट्सअप, टेलिग्राम का यूज करते हैं। ऐसे में आज तार दिवस पर युवा पीढ़ी के लिए यह खबर जरूर रोचक होगी।
2013 में बंद हो चुकी है तार सेवा
दरअसल इस तार शब्द से आज की हमारी युवा पीढ़ी इसलिए अवगत नहीं है कि 16 जुलाई 2013 ऐसा दिन था जब 163 साल पुरानी तार सेवा समाप्त कर दी गई थी।अपने अंतिम वर्षों में इससे प्राप्त होने वाला राजस्व 75 लाख का था। लेकिन इस सेवा की लागत 100 करोड़ रुपए आ रही थी। अगले वर्ष यानी 2023 में तार सेवा बंद किए हुए 10 साल पूरे हो जाएंगे। नई पीढ़ी शायद इस बात पर यकीन न करे कि डाकिया जब तार लेकर किसी के दरवाजे पर आता था, तो लोगों के दिलों की धड़कनें तेज हो जाती थीं, कई बार तो तार का नाम सुनते ही लोग रोना शुरू कर देते थे। ये पंक्तियां पढ़कर अगर आप भी तार के बारे में जानने को जिज्ञासु हैं, तो ये खबर पढ़कर आप अपनी नॉलेज बढ़ाइए और जिज्ञासा शांत कर लीजिए।
कैसे भेजा जाता था?
इस संबंध में डाकघर से मिली जानकारी के मुताबिक जिस तरह शहरों का टेलीफोन कोड है, उसी तरह तार(टेलीग्राम) करने के लिए जिलों और शहरों का भी टेलीग्राम कोड हुआ करता था। टेलीग्राम कोड छह अक्षरों का होता था। टेलीग्राम करने के लिए प्रेषक अपना नाम, संदेश और प्राप्तकर्ता का पता आवेदन पत्र पर लिखकर देता था, जिसे टेलीग्राम मशीन पर अंकित किया जाता था और शहरों के कोड के हिसाब से प्राप्तकर्ता के पते तक भेजा जाता था।
एक तार से जुड़े होते थे सभी सेंटर
टेलीग्राम करने के लिए पहले मोर्स कोड का इस्तेमाल होता था। विभाग के सभी सेंटर एक तार से जुड़े थे। मोर्स कोड के तहत अंग्रेजी के अक्षर व गिनती के अंकों का डॉट (.) और डैश (-) में सांकेतिक कोड बनाया गया था। सभी टेलीग्राम केंद्रों पर एक मशीन लगी होती थी। जिस गांव या शहर में टेलीग्राम करना होता था, उसके जिले या शहर के केंद्र पर सांकेतिक कोड से संदेश लिखवाया जाता था।
बजती थी घंटी और पहुंचती थी सूचना
मशीन के माध्यम से संबंधित जिले या शहर के केंद्र पर एक घंटी बजती थी, जिससे तार मिलने की जानकारी प्राप्त होती थी और सूचना तार के माध्यम से केंद्र पर पहुंचती थी। घंटी की सांकेतिक कोड को सुनकर कर्मचारी प्रेषक द्वारा भेजे गए संदेश को लिख लेता था। गड़बड़ी की आशंका के चलते टेलीग्राम संदेश बहुत छोटा होता था। संदेश नोट करने के बाद डाकिया उसे संबंधित व्यक्ति तक पहुंचा देता था।
तार का नाम सुनते ही रोने लगते थे लोग
ये अपने आप में ही रोचक है कि आखिर ऐसा तार में क्या था कि तार का नाम सुनते ही लोगों के दिल की धड़कनें बढ़ जाती थीं या कुछ लोग संदेश सुनने से पहले ही रोना शुरू कर देते थे। दरअसल तार अक्सर मृत्यु या किसी की तबीयत खराब होने की जानकारी देने के लिए ही भेजा जाता था। इसी वजह से जब किसी घर में डाकिया तार लेकर आता था तो लोगों के दिलों की धड़कन तेज हो जाती थी और कई बार तो बगैर तार पढ़े ही लोग रोना शुरू कर देते थे।
खुफिया विभाग के लिए बेहद उपयोगी था तार
जिम्मेदारों के मुताबिक तार सेवा सेना और पुलिस के साथ ही खुफिया विभाग के लिए बेहद उपयोगी थी। तत्काल संदेश पहुंचाने और गोपनीयता बरकरार रखने की वजह से सेना और पुलिस के साथ ही खुफिया संदेश भेजने के इच्छुक लोग इसका प्रयोग किया करते थे।
आखिरी दिन 20 हजार लोगों ने किया था शौक पूरा
डाकघर के अधिकारियों ने बताया कि टेलीग्राम बंद होने की सूचना मिलते ही कुछ लोगों ने इसमें इंट्रेस्ट दिखाया। धीरे-धीरे इनकी संख्या इतनी बढ़ी कि 20 हजार तक पहुंच गई। यानी 16 जुलाई 2013 को तार सेवा के आखिरी दिन था। 13 जुलाई को 20 हजार लोगों ने अपना शौक पूरा करते हुए तार भेजा और अपने प्रियजनों का विश किया।
राहुल गांधी को मिला आखिरी तार
देश में टेलीग्राम के माध्यम से पहला संचार 1850 में कोलकाता और डायमंड हार्बर के बीच हुआ, जो मुख्य शहर से लगभग 50 किलोमीटर दूर था। वहीं 14 जुलाई 2013 को देश का आखिरी टेलिग्राम संदेश भेजा गया। और यह आखिरी टेलिग्राम संदेश अश्विनी मिश्रा ने राहुल गांधी को भेजा था।
ये भी रोचक फैक्ट्स
* टेलीग्राफ का आविष्कार सैमुअल मोर्स ने किया था। मोर्स कोड, टेलीग्राम संदेश भेजने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला कोड था। इसका नाम उन्हीं के नाम पर रखा गया था।
* संदेशों को विद्युत संकेतों का उपयोग करके संप्रेषित किया जाता था, जो तारों को आपस में जोड़कर प्रेषित किए जाते थे।
* फोन के अस्तित्व में आने से पहले बहुत से भारतीयों के लिए टेलीग्राम संचार का सबसे तेज माध्यम था।
Published on:
09 Oct 2022 04:58 pm
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