
baji arout and virendra sahwag
(पत्रिका ब्यूरो,भुवनेश्वर): आजादी की लड़ाई लड़ने वालों में ओडिशा का एक ऐसा भी क्रांतिकारी था जिसकी फिरंगियों ने 12 साल की उम्र में ही गोली मारकर हत्या कर दी थी। इसका नाम था बाजी राउत। यह घटना 11 अक्टूबर 1938 की है। देश के महान क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग (जिन्हें आक्रामक बैटिंग के कारण मुलतान का सुलतान, नजफगढ़ का छोरा और न जाने क्या क्या कहा जाता रहा), ने सोशल मीडिया में बाजी राउत को तले दिल से सैल्यूट कहा है। उनका कहना है कि बाजी राउत की कहानी देशप्रेम का संदेश देती है। देश से बढ़कर कुछ नहीं है। इस बाल शहीद को याद रखने की जरूरत है।
अविस्मरणीय हैं 11 अक्टूबर का दिन
राज्य के स्वर्णिम इतिहास में कभी न भूलने वाली तारीख 11 अक्टूबर है। आज से करीब 80 वर्ष पहले 11 अक्टूबर 1938 को फिरंगी सैनिकों ने ढेंकानाल जिले में कहर बरपाया था, जिसमें नीलकंठपुर गांव के 12 साल के एक किशोर बाजी राउत पर गोली मारकर हत्या कर दी थी।
देश का सबसे कम उम्र का शहीद बाजी राउत
आजादी की लड़ाई के इतिहास में बाजी राउत को देश का सबसे कम उम्र का शहीद बताया गया है। देश को हिला देने वाली इस घटना ने स्वतंत्रता आंदोलन की चिंगारी को ज्वाला में तब्दील कर दिया था।
देशप्रेम की भावना से भर देने वाली है बाजी राउत दास्तां
10 अक्टूबर 1938 को ब्रिटिश पुलिस कुछ लोगों को गिरफ्तार कर भुवनेश्वर थाना ले आई थी। इनकी रिहाई की मांग जोर पकडऩे लगी। पुलिस ने प्रदर्शन कर रहे लोगों पर गोलियां चलाईं, जिसमें दो लोगों की मौत हो गई। लोगों के बढ़ते आक्रोश को देख पुलिस ने ब्राह्मणी नदी के नीलकंठ घाट होते हुए ढेंकानाल की ओर भागने की कोशिश की। ये लोग 11 अक्टूबर को बारिश में भीगते हुए नदी किनारे पहुंचे। बाजी राउत नदी तट पर नाव के साथ थे। उन्हें पार कराने का हुक्म दिया गया। बाजी ने सेना के जुल्मों की कहानी सुन रखी थी। उन्होंने सेना को पार उतारने से साफ इंकार कर दिया। सैनिकों ने उन्हें मारने की धमकी दी। हुक्म न मानने पर एक सैनिक ने बंदूक की बट से उनके सिर पर प्रहार किया, वह लहूलुहान होकर गिर पड़े और फिर उठ खड़े हुए और अंग्रेजों को पार उतारने से मना कर दिया।
गुस्साए ब्रिटिश सैनिकों ने दागी गोलियां
गुस्साए ब्रिटिश सैनिकों ने बाजी राउत को गोलियों से छलनी कर दिया। इस दौरान बाजी के साथ गांव के लक्ष्मण मलिक, फागू साहू, हर्षी प्रधान और नाता मलिक भी मारे गए। इन बच्चों के बलिदान की चर्चा पूरे देश में फैल गई।
तेज हुआ आंदोलन
आंदोलनकारी आक्रोशित हो उठे। यहीं से स्वतंत्रता आंदोलन की क्रांतिकारी इबारत शुरू हो गई। बाजी राउत का अंतिम संस्कार उनके गांव नीलकंठपुर खाननगर में हुआ। तब ढेंकानाल, कटक जिले में आता था। आइआइटी मुंबई के उत्कल छात्रों की शाखा ने सबसे कम उम्र के इस शहीद की स्मृति में बाजी राउत सम्मान शुरू किया। अनुगुल जिले में बाजी राउत की स्मृति में एक विद्यालय और छात्रावास चलाया जाता है। पूर्व मुख्यमंत्री नवकृष्ण चौधरी की पुत्री इसे चलाती हैं।
Published on:
06 Oct 2018 05:11 pm

बड़ी खबरें
View Allभुवनेश्वर
ओडिशा
ट्रेंडिंग
